फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Gorakhpur News: चाय का कप हो या पानी की बोतल, हर दिन बढ़ रहा माइक्रोप्लास्टिक का खतरा

Fri, 03 Jul 2026 02:40 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
विज्ञापन
विज्ञापन
गोरखपुर। चाय का कप हो या पानी की बोतल, हर जगह प्लास्टिक का प्रयोग बढ़ गया है। इसका सबसे खतरनाक रूप माइक्रोप्लास्टिक मानव शरीर और पर्यावरण दोनों के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राणि विज्ञान के शोधार्थी शिवम कुमार यादव ने प्रो. विनय कुमार सिंह के निर्देशन में माइक्रोप्लास्टिक के इस खतरे पर अध्ययन किया है।
विज्ञापन

अध्ययन में पाया गया कि पांच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कण, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है, अब हवा, पानी, मिट्टी, भोजन और यहां तक कि मानव शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंच चुके हैं। यही वजह है कि इसे 21वीं सदी की सबसे बड़ी उभरती पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल किया जा रहा है।
शोधार्थी शिवम ने बताया कि रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक की बोतलें, डिब्बे, पैकेजिंग सामग्री, सिंथेटिक कपड़े, डिस्पोजेबल बर्तन और कॉस्मेटिक्स माइक्रोप्लास्टिक के प्रमुख स्रोत हैं। समय के साथ ये वस्तुएं टूटकर बेहद सूक्ष्म कणों में बदल जाती हैं, जो भोजन, पानी और हवा के जरिये हमारे शरीर में प्रवेश कर जाती हैं।
विज्ञापन

रिपोर्ट के अनुसार, घरों में प्लास्टिक के डिब्बों में लंबे समय तक अचार या अन्य अम्लीय खाद्य पदार्थ रखना सुरक्षित नहीं माना जाता। इसी तरह गर्म चाय या कॉफी को प्लास्टिक या प्लास्टिक-लेपित डिस्पोजेबल कपों में पीने से सूक्ष्म प्लास्टिक कण पेय पदार्थ में मिल सकते हैं। शादी-ब्याह और अन्य आयोजनों में गर्म भोजन के लिए डिस्पोजेबल प्लास्टिक बर्तनों का उपयोग भी स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है।
अध्ययन में माइक्रोप्लास्टिक के कण रक्त, फेफड़ों, यकृत, प्लेसेंटा और स्तन दूध तक में पाए जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि शोधार्थी का कहना है कि इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर अभी अध्ययन जारी है लेकिन शुरुआती अध्ययनों में शरीर में सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, हार्मोनल असंतुलन, श्वसन संबंधी समस्याएं व प्रजनन स्वास्थ्य पर संभावित असर के संकेत मिले हैं।

प्लास्टिक स्वास्थ्य ही नहीं, पर्यावरण के लिए भी खतरा
माइक्रोप्लास्टिक केवल मानव स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि पर्यावरण के लिए भी बड़ा खतरा बन चुका है। नदियों और समुद्रों में रहने वाले जीव इसे भोजन समझकर निगल लेते हैं, जिससे उनके विकास और प्रजनन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। वहीं कृषि भूमि में इसके जमा होने से मिट्टी की गुणवत्ता और फसल उत्पादन भी प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।
विज्ञापन


प्रयोगशाला और प्रारंभिक मानव अध्ययनों के आधार
- शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन बढ़ सकती है।
- आंतों के लाभकारी सूक्ष्मजीवों का संतुलन प्रभावित हो सकता है।
- कुछ प्लास्टिक रसायन हार्मोन प्रणाली में हस्तक्षेप कर सकते हैं।
- प्रजनन स्वास्थ्य पर संभावित प्रभावों का अध्ययन जारी है।
- फेफड़ों में सूक्ष्म कणों के जमा होने से श्वसन तंत्र प्रभावित हो सकता है।
- हृदय एवं रक्त वाहिकाओं पर संभावित प्रभावों का भी अध्ययन किया जा रहा है।

बचने के उपाय
- गर्म भोजन के लिए स्टील, कांच या मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करें।
- अचार और अम्लीय खाद्य पदार्थ कांच के जार में रखें।
- प्लास्टिक की बोतलों का बार-बार उपयोग न करें।
- सामान्य प्लास्टिक कंटेनर में भोजन गर्म करने से बचें।
- सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग कम करें।
- प्राकृतिक रेशों वाले कपड़ों को प्राथमिकता दें।
- प्लास्टिक कचरे को खुले में न जलाएं।
- प्लास्टिक का पृथक्करण और पुनर्चक्रण बढ़ाएं।
- जहां संभव हो, पर्यावरण अनुकूल उत्पादों का चयन करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें