एसपी ने बताया कि वलिस्टर कछुओं को पकड़ने में माहिर है। वह अपने साथियों संग मिलकर कछुओं को पकड़ता है। एक कछुआ आठ से दस किलो का मिला है। उसे यह लोग 300 से 400 रुपये प्रति किलो में बेच देते हैं। वहीं, कोलकाता जाने के बाद प्रति कछुआ 25 से 30 हजार रुपये में विदेशों में बेच दिया जाता है। वहां पर इसका इस्तेमाल शक्तिवर्धक दवाओं को बनाने में किया जाता है।
बिहार, यूपी, पश्चिम बंगाल, असम आदि राज्यों में फैला है जाल
एसडीओ ने बताया कि इन कछुओं का मांस निकालने के बाद हड्डी व कवच से शक्तिवर्धक दवा बनाई जाती है। इसके लिए गंगा में पाए जाने वाले कछुओं को बेहतर माना जाता है। जबकि, बीच का हिस्से का मांस खाया जाता है।
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बंगाल व त्रिपुरा में पांच से आठ हजार रुपये प्रति कछुआ मिलती है जबकि थाईलैंड, बांग्लादेश, मलयेशिया और चीन में इसकी कीमत 25 से 30 हजार रुपये प्रति कछुआ मिल जाती है। जबकि, इसका मांस करीब दो हजार रुपये किलो तक बिकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांस की भी कीमत करीब पांच हजार रुपये प्रति किलो तक मिलती है। भारत में कछुओं की तस्करी का जाल बिहार, यूपी, बंगाल, असम आदि राज्यों में फैला है।
महिलाएं भी तस्करी में शामिल
कछुओं की तस्करी में महिलाएं भी शामिल हैं। तस्करी में शामिल लोग कछुओं को एक से दूसरी जगह पहुंचाने का काम करते हैं। इन लोगों को इस काम के लिए मजदूरी मिलती है। कछुओं की तस्करी में अमेठी और सुल्तानपुर का एक सक्रिय गैंग शामिल है। इस गैंग की महिला सदस्य पहले यहां कई बार रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन पर पकड़ी भी जा चुकी हैं।