वैसे तो बाजारों की भी साप्ताहिक बंदी होती है, ताकि लोग अपने परिवार को भी समय दे सकें, लेकिन भाग दौड़ और भौतिकवादी इस युग ने लोगों की प्राथमिकताएं बदल दी है। परिवार से ज्यादा व्यापार को समय दिया जाने लगा है।
अक्सर साप्ताहिक बंदी के दिन भी दुकानदार दुकान खोले रखते हैं। लेकिन जनता कर्फ्यू ने अरसे बाद व्यापारियों को परिवार के साथ समय बिताने का मौका भी दिया। किसी ने अपने बॉलकानी में लगाए गए पौधों को सजा संवारा तो किसी ने अपने बच्चों के साथ कैरम खेला तो किसी ने लूडो।
सुनंदा टावर व्यापारी राकेश गोयल ने कहा कि भले ही इसे जनता कर्फ्यू का नाम दिया गया है, लेकिन वास्तव में यह केयर फॉर पब्लिक है। कोरोना वायरस की भयावहता का अंदाज लगाना बहुत ही मुश्किल है। सोशल डिस्टेंशिंग ही इसका सबसे कारगर दवा है।
ऐसे में हमने इसका पूरी तरह से समर्थन किया है। साथ ही अपने पूरे परिवार के साथ समय बिताना मुनासिब समझा है। बागवानी का काफी शौक है, लिहाजा सुबह गमलों को व्यवस्थित किया। पानी डाला और उसे सजाने संवारने का काम किया। इसके साथ ही सहज योग के जरिए मेडिटेशन किया।
अंबेश्वरी अपार्टमेंट व्यापारी अमित जगनानी ने कहा कि भागदौड़ की इस जिंदगी में काम से फुर्सत कहां मिलती है। अपनी याद में रविवार को ऐसा पहली बार हुआ है कि जब अपना ऑफिस को नहीं खोला। लिहाजा सुबह से 10 बजे तक रोज की दिनचर्या की तरह काम किया।
इसके बाद कोरोना वायरस को लेकर टीवी मोबाल पर संदेशों को पढ़ने और सुनने के बीच अपने बच्चों के साथ समय साझा किया। कैरम के अलावा लूडो भी खेला। साथ ही उन्हें कोरोना वायरस से बचाव संबंधी सारी जानकारी भी साझा की। अपने अपार्टमेंट के लिफ्ट के इस्तेमाल के दौरान विभिन्न सावधानियों के संबंध में जानकारी दी।