पुलिस के सुस्त पड़ते ही मरीज माफिया फिर से जाल बुनने लगे हैं। पिछले महीने ही एक निजी अस्पताल ने अपने मरीज लाने के लिए आशा कार्यकर्ताओं की बैठक तक बुला दी थी। वहीं, लापता हो चुके अवैध एंबुलेंस संचालक भी फिर सरकारी अस्पतालों के आसपास अपना अड्डा जमाने लगे हैं।
ऐसे में हर महीने जिला अस्पताल से 40-45 तो मेडिकल कॉलेज से 10-15 मरीज लापता होने लगे हैं। मरीज माफिया पर अंकुश लगाने के लिए जिला अस्पताल में पुलिस चौकी खोलने की कवायद शुरू हुई थी, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ा।
मेडिकल कॉलेज चौकी की ओर से भी निगरानी कमजोर हुई तो दोनों जगहों पर माफिया के दलालों की गतिविधियां बढ़ गई हैं। करीब 10 दिन पहले जिला अस्पताल में इसे लेकर हंगामा भी हुआ था।
शहर में खुले कई निजी अस्पताल मरीज माफिया के सहारे ही चलते हैं।
सरकारी अस्पताल पहुंचे मरीजों को बेहतर इलाज का झांसा देकर दलाल मरीज को निजी नर्सिंग होम पहुंचा देते हैं, जहां इलाज के नाम पर तीमारदारों से मनमाना रुपये वसूले जाते हैं। बीते फरवरी में मेडिकल कॉलेज से तीन मरीजों को पैडलेगंज स्थित यीशु अस्पताल में भर्ती कर इलाज किया जा रहा था।
एक मृत मरीज को आईसीयू में भर्ती कर इलाज करने और बदले में परिजनों से तीन लाख रुपये का बिल भरने का मामला सामने आने के बाद रात में छापा पड़ा तो इस धंधे की पोल खुली।
इसके बाद शहर में मेडिकल कॉलेज रोड और पादरी बाजार रोड पर भी अवैध अस्पताल पकड़े गए थे। पुलिस ने सक्रियता दिखाई तो चारों तरफ हंगामा मचा और माफिया ने अपना धंधा बंद कर दिया था, लेकिन लोकसभा चुनाव में पुलिस की व्यस्तता ने उन माफिया को फिर से अपना जाल बुनने का अवसर दे दिया। अब फिर वे सरकारी अस्पतालों से मरीजों को सेटिंग वाले निजी अस्पताल पहुंचाने लगे हैं।
कहां जा रहे हर महीने लापता हो रहे मरीज
अस्पताल में भर्ती कोई मरीज अगर बिना डॉक्टर की सहमति से इलाज बीच में छोड़कर चला जाता है तो उसे रिकॉर्ड में लामा (लापता) दर्ज किया जाता है। इसी व्यवस्था का फायदा उठाते हुए माफिया, मरीजों को बरगलाकर जब अपने साथ ले जाते हैं तो उसकी बीएसटी पर अस्पताल कर्मी लामा दर्ज कर अपने कर्तव्य से मुक्ति पा लेते हैं।
बीते फरवरी में जब मरीज माफिया पर पुलिस ने सख्ती दिखाई तो जिला अस्पताल में लामा मरीजों की संख्या कम हो गई थी। फरवरी में जहां 37 मरीज लामा दर्ज किए गए थे, वहीं मार्च में केवल 26 मरीज ही लामा हुए, लेकिन पुलिस जैसे ही चुनाव में व्यस्त हुई, अप्रैल में फिर लामा मरीज बढ़ने लगे।
जिला अस्पताल से अप्रैल में 42, मई में 44 और जून में 57 मरीज लामा हो गए। यही हालत बीआरडी मेडिकल कॉलेज का भी है। यहां अप्रैल में आठ मरीज लामा हुए, तो वहीं मई में यह संख्या 12 और जून में 10 थी। आश्चर्य यह है कि माफिया का नेटवर्क तोड़ने में लगी पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के अफसरों ने यह जानने का भी प्रयास नहीं किया कि हर महीने ये मरीज इलाज छोड़कर कहां जा रहे हैं।
आशा कार्यकर्ताओं के मामले को डाल दिया ठंडे बस्ते में
मेडिकल कॉलेज के नजदीक खुले एक निजी नर्सिंग होम संचालक ने अपने से जुड़ीं आशा कार्यकर्ताओं की बैठक बुलाई थी। इसमें दो ब्लॉकों से 60 कार्यकर्ता पहुंच गईं। भीड़ जुट जाने के चलते मामला सार्वजनिक हो गया तो आशा कार्यकर्ताओं के ही दूसरे समूह ने पहुंचकर हंगामा किया।
मामले की जांच के आदेश दिए गए, लेकिन न तो जांच रिपोर्ट आई और न ही कोई कार्रवाई की गई। पुलिस ने भी इस मामले की तह में जाने का प्रयास नहीं किया।
एसआईसी जिला अस्पताल डॉ राजेंद्र ठाकुर ने बताया कि जिला अस्पताल से मरीजों को बरगलाकर ले जाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए हमने डॉ. राजेश कुमार को नया नोडल अफसर नामित कर दिया है। इसके अलावा कर्मचारियों की ड्यूटी में भी बदलाव किया गया है। सीसीटीवी कैमरे से भी निगरानी की जा रही है। व्यवस्था में बदलाव होने पर माफिया ने शह देकर अस्पताल में हंगामा कराने का भी प्रयास किया था।
प्राचार्य बीआरडी मेडिकल कॉलेज डॉ रामकुमार जायसवाल ने बताया कि मरीज माफिया अक्सर शाम के वक्त ही सक्रिय होते हैं। हमने कार्यकाल के आरंभ में ही कई उपाए किए थे। हर संभावित जगह पर सुरक्षा कर्मियों की ड्यूटी लगाई गई है।
माइक से इस बात की घोषणा कराई जा रही है कि अस्पताल में सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं, किसी के बहकावे में न आएं। इसके अलावा अब इमरजेंसी वार्ड में अलग से ही विजिलेंस टीम लगाई गई है जो इस बात की निगरानी करती है कि किसी मरीज को कोई बरगला तो नहीं रहा।