मरीज माफिया: नाम बदलकर चलाया नर्सिंग होम...आपसी खींचतान में बच भी गए
जागृति, फिर न्यू जागृति नर्सिंग होम नाम से चलाया, पकड़े जाने के बाद से बंद करके फरार
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। अवैध नर्सिंग होम पर कार्रवाई की मुहिम जिस सत्यम नर्सिंग होम से शुरू हुई थी, वह नाम बदलकर संचालित किए जाने वाले न्यू जागृति नर्सिंग होम के मामले में थम गई। मेडिकल कॉलेज में पकड़े जाने के बाद भी तहरीर के अभाव में पुलिस की चंगुल से छूटा मरीज माफिया अब अपना नया नेटवर्क खड़ा करने की तैयारी में है। खबर है कि नर्सिंग होम तो बंद है, लेकिन उसे दूसरे नाम से चलाने की पूरी तैयारी कर ली गई है। इंतजार है तो बस नए नाम से उसका पंजीकरण होने का।
इलाज के नाम पर मरीजों के शोषण का मामला जब-तब पुलिस के पास पहुंचता ही रहता है। एसएसपी डॉ. गौरव ग्रोवर ने इस मामले में व्यक्तिगत रुचि दिखाई तो पुलिस ने जांच की। इसके बाद मरीज माफिया, एंबुलेंस माफिया और फिर खून माफिया सामने आए। सख्त कार्रवाई की गई तो बहुत हद तक फर्जी अस्पताल के संचालन और मरीजों की खरीद-फरोख्त पर रोक भी लगी, लेकिन इसे जड़ से खत्म नहीं किया जा सका। वजह साफ है, जिस महकमे की इसे रोकने की जिम्मेदारी है, वहीं के अफसर आंख बंद किए बैठे रहते हैं। एक मामले में तो तीन दिन के इंतजार के बाद पुलिस को कदम पीछे खींचने पड़े।
बीते 13 मार्च को बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हुई एक घटना ने इस मामले में पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के बीच चल रही खींचतान को भी उजागर कर दिया। मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग से दो दिन में भर्ती तीन मरीज बिना किसी सूचना के लापता हुए तो आशंका जताई गई कि मरीज माफिया ने इन्हें झांसे में लेकर किसी निजी अस्पताल को बेच दिया होगा। इसके बाद कॉलेज के कर्मचारियों ने जाल बिछाकर एक माफिया को मरीज देने के लिए परिसर में बुलाया। कुछ देर बाद कार से तीन लोग मेडिकल कॉलेज पहुंचे, जिन्हें पकड़कर मेडिकल कॉलेज पुलिस चौकी को सौंपा गया।
इसके बाद फिर किसी बड़े गिराेह के खुलासा की उम्मीद जगी। लेकिन, एक दिन बाद ही पूरा मामला अलग ही दिशा में घूम गया। मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभागाध्यक्ष डॉ. रूमा सरकार ने पुलिस को पत्र देकर बताया कि दो-तीन महिला मरीज बिना बताए गायब हैं। आशंका है कि उन्हें दलालों ने गुमराह किया है। इस पत्र का संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करें। उधर, गुलरिहा पुलिस का कहना था कि चूंकि आरोपियों को मेडिकल कॉलेज कर्मियों ने पकड़ा है, इसलिए तहरीर मिले तभी केस दर्ज होगा। तीन दिन तक चली रस्साकसी के बाद अंत में पुलिस ने दो आरोपियों को छोड़ दिया और एक का शांतिभंग में चालान कर दिया। वह जमानत कराकर छूट गया।
अगर मेडिकल कॉलेज प्रशासन या स्वास्थ्य विभाग ने अपनी तरफ से केस दर्ज कराने के लिए तहरीर दी होती तो आरोपी जेल में होते। जिससे, भविष्य में इनकी तरफ से अवैध अस्पताल संचालित करने की आशंका खत्म हो जाती।
.........
तालमेल के अभाव में नहीं हुई कार्रवाई
मरीज माफिया, एंबुलेंस माफिया और खून माफिया के मामले में पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के बीच अंदरूनी तौर पर चल रही खींचतान खुलकर सामने आई। जब भी पुलिस ने अपने स्तर से कार्रवाई की तो स्वास्थ्य विभाग की टीम ने उस मामले से खुद को दूर रखा। खून माफिया मामले में मेडिकल कॉलेज के दोषियों पर कार्रवाई तक हुई, जब पुलिस ने केस में उनका नाम शामिल किया। एंबुलेंस माफिया मामले में स्वास्थ्य विभाग ने अपनी तरफ से कोई कार्रवाई ही नहीं की। जब भी मामले पकड़े गए तो केवल पुलिस ने ही सख्ती दिखाई।
वर्जन
बिना डॉक्टर के नर्सिंग होम संचालित होने या फिर मरीजों की सेहत से खिलवाड़ करने के जो भी मामले सामने आए है, उसमें पुलिस ने केस दर्ज कर कार्रवाई की। मरीज, एंबुलेंस और खून माफिया सभी पर गैंगस्टर की कार्रवाई कर उन्हें जेल भी भेजा गया। मेडिकल कॉलेज से न्यू जागृति मामले में पकड़े गए आरोपी के खिलाफ मेडिकल कॉलेज से तहरीर न आने की वजह से शांतिभंग में चालान किया गया था। लेकिन, पुलिस अपनी जांच जारी रखी है, जो भी लोग इसमें शामिल है, वह बच नहीं पाएंगे। सब पर कार्रवाई की जाएगी।
-कृष्ण कुमार बिश्नोई, एसपी सिटी