प्रतिस्पर्धा हर दौर में रही है। समय के साथ यह और मुश्किल होती जा रही है। अभिभावक बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करा रहे हैं तो उनकी अपेक्षाएं भी अनंत होती जा रही हैं। बड़ी संख्या में अभिभावक अपने बच्चों को कोटा भेजने का मतलब सफलता की गारंटी मानते हैं। कुछ युवा इन्हीं अपेक्षाओं का दबाव झेल नहीं पा रहे और मौत को गले लगा ले रहे हैं।
हर वर्ष की तरह इस बार भी देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी ह्दय विदारक खबरें आईं, जिन्होंने न सिर्फ मन को झकझोर दिया बल्कि समाज के समक्ष नए सवाल भी छोड़ दिए। इस पर मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री और कॅरिअर काउंसलर ने अपनी बात रखी।
करो या मरो वाले दौर से गुजर रहे बच्चे
गोरखपुर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. गरिमा सिंह ने बताया कि छात्रों की आत्महत्या के पीछे सबसे बड़ा कारण बहुत ज्यादा उम्मीदों का बोझ है। माता-पिता, शिक्षकों और समाज की ओर से परफेक्शन हासिल करने या अच्छे कॅरिअर (जैसे मेडिकल, इंजीनियरिंग या सिविल सर्विस) को चुनने का बहुत ज्यादा दबाव होता है। कुछ खास परीक्षाओं को ''''करो या मरो'''' वाली स्थिति में बदल देते हैं। ऐसे में अगर नतीजे उम्मीद के मुताबिक न हों तो बहुत ज्यादा बेचैनी और निराशा हो सकती है। अपने शहर में टॉप स्टूडेंट रहने के बाद ऐसे माहौल में जाना जहां हर कोई बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो, आत्मविश्वास को बुरी तरह नुकसान पहुंचा सकता है। अभिभावकों को ऐसा लगता है कि टॉप रैंक पाने के लिए घर से दूर जाना एक जरूरी कुर्बानी है।
मानसिक और सामाजिक दबाव में तैयारी कर रहे छात्र
गोरखपुर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पवन कुमार ने बताया कि वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों को अत्यधिक मानसिक और सामाजिक दबावों का सामना करना पड़ रहा है। इस वजह से विद्यार्थी समाज से अत्यधिक नियंत्रित महसूस करता है। समाजशास्त्री दुर्खीम के अनुसार, यही अत्यधिक नियंत्रण आत्महत्या का एक महत्वपूर्ण कारण बनता है। इंजीनियरिंग और मेडिकल के अच्छे शिक्षण संस्थानों में सीट्स बहुत कम हैं और परिक्षार्थियों की संख्या अत्यधिक, जो अभ्यर्थियों को गहरे मानसिक दबाव में धकेलती है। गोरखपुर ने पिछले कुछ सालों में प्रतियोगी परीक्षा की दिशा में काफी प्रगति की है। कई बच्चों ने गोरखपुर में ही रहकर सकारात्मक रूप से तैयारी कर सफलता प्राप्त की।
विद्यार्थियों की क्षमता और रुचि को समझना जरूरी
प्रसिद्ध कॅरिअर काउंसलर पुर्णेंदु शुक्ल ने बताया कि कोटा जाने की प्रवृत्ति का प्रमुख कारण वहां का विकसित प्रतियोगी परीक्षा इकोसिस्टम, अनुभवी फैकल्टी और राष्ट्रीय स्तर का प्रतिस्पर्धी माहौल है। गोरखपुर में प्रतिभा की कमी नहीं है लेकिन उच्चस्तरीय मेंटरशिप, कॅरिअर जागरूकता और मानसिक स्वास्थ्य सहायता को अभी और मजबूत करने की जरूरत है। आत्महत्या जैसी घटनाओं का एक बड़ा कारण विद्यार्थियों की क्षमता और रुचि को समझे बिना उन पर अत्यधिक अपेक्षाएं थोपना भी है। जब छात्र उन अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते, तो वे अवसाद का शिकार हो जाते हैं। हर विद्यार्थी की क्षमता अलग होती है, इसलिए कॅरिअर का चयन भी उसी के अनुरूप होना चाहिए। नियमित कॅरिअर काउंसिलिंग व भावनात्मक सहयोग ऐसी घटनाओं को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।