बच्चे बात करें तो उन्हें बीच में न रोके। मेहमानों के सामने बच्चे पर बात करने का दबाव न बनाएं। बच्चे को आराम से बोलने की प्रेरित करें। उनसे तोतली आवाज में बात न करें।
अभिभावक इसके लिए खुद ही जिम्मेदार
डॉ आदित्य पाठक ने बताया कि अभिभावकों को बच्चे की हकलाहट या तुतलाहट पहले तो अच्छा लगता है। इन सबके बीच रिश्तेदार भी आते हैं, तो अभिभावक भी उनके सामने उसी भाषा में बच्चों से बात करते हैं। यही बोलना उनकी आदतों में शुमार हो जाता है। इससे निजात के लिए शुरुआती तौर पर बच्चे को आंवला, बादाम, काली मिर्च, दालचीनी, हरा धनिया खिला सकते हैं। इसकी काउंसिलिंग भी जरूरी है।
पांच से 14 वर्ष के बच्चे हकलाहट की समस्या से हैं परेशान
डॉ आदित्य पाठक ने बताया कि पांच से लेकर 14 वर्ष तक के बच्चे हकलाहट की समस्या लेकर आते हैं। ऐसे मरीजों के अभिभावकों को सलाह दी जाती है कि वह बच्चों को सही बोलने के लिए प्रेरित करें। अगर बच्चा हकला रहा है तो उसे आराम से बैठकर बातचीत के तरीके बताएं। क्योंकि, इसकी विशेष दवा नहीं होती है।