उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में जब भी पुलिस की बंदूक से कोई बदमाश मारा जाता है तो उसको पनाह देने वाले का नाम भी सामने आता है। चर्चा पुलिस महकमे से लेकर जांच तक पहुंचती है, लेकिन अंजाम कुछ नहीं निकलता। शरणदाता पर कार्रवाई के लिए पुलिस कभी तेजी नहीं दिखा पाती है। चूंकि पुलिस बदमाशों को पनाह देने वालों पर शिकंजा नहीं कस पाती तो शरणदाना न सिर्फ बदमाशों को पनाह देते रहते हैं। बल्कि बदमाशों से दोस्ती से फायदा उठा कर कई गैरकानूनी काम निकलवा लेते हैं। पुलिस भी असल बदमाश को मारने के बाद ज्यादा तह तक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती है। यही वजह है कि शरणदाता आसानी से बच जाते हैं और नेपाल से सटे गोरखपुर में बाहर के बड़े अपराधी आकर पनाह लेकर आपराधिक गतिविधि दूसरे जिलों में चलाते रहते हैं।
ताजा मामला एसटीएफ से मुठभेड़ में अंबेडकरनगर के बदमाश परवेज अहमद के मारे जाने के बाद सामने आया है। पता चला है कि कैंपियरगंज के पास सफेदपोश की शरण में वह अक्सर आकर रुका करता था लेकिन वह कौन है, इसके बारे में पुलिस अभी कुछ भी बताने से बच रही है। पुलिस के जिम्मेदारों का कहना है कि मामले की छानबीन चल रही है। इससे पहले भी इस तरह के मामले सामने आ चुके हैं।
2005 में छताई पुल पर आजमगढ़ के तीन बदमाशों को पुलिस ने ढेर कर दिया था। तब सत्ताधारी पार्टी के एक नेता का नाम शरणदाता के रूप में सामने आया था। नेता की भूमिका की जांच कौन कहे उन्होंने दमदारी से मुख्यमंत्री तक एसएसपी की ही शिकायत कर दी थी। एसएसपी रहे बीबी बख्शी को मुख्यमंत्री के सामने पेश होकर सफाई देनी पड़ी थी। फिर फाइल बंद हो गई थी।