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यूपी: बदमाशों के शरणदाताओं पर नहीं हुई अबतक कार्रवाई, उदाहरण हैं ये केस

Tue, 08 Jun 2021 02:41 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।

सार

कई बार सामने आए हैं सफेदपोश शरणदाताओं के नाम पर नहीं दबोचे जाते।
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प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : iStock
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में जब भी पुलिस की बंदूक से कोई बदमाश मारा जाता है तो उसको पनाह देने वाले का नाम भी सामने आता है। चर्चा पुलिस महकमे से लेकर जांच तक पहुंचती है, लेकिन अंजाम कुछ नहीं निकलता। शरणदाता पर कार्रवाई के लिए पुलिस कभी तेजी नहीं दिखा पाती है। चूंकि पुलिस बदमाशों को पनाह देने वालों पर शिकंजा नहीं कस पाती तो शरणदाना न सिर्फ बदमाशों को पनाह देते रहते हैं। बल्कि बदमाशों से दोस्ती से फायदा उठा कर कई गैरकानूनी काम निकलवा लेते हैं। पुलिस भी असल बदमाश को मारने के बाद ज्यादा तह तक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती है। यही वजह है कि शरणदाता आसानी से बच जाते हैं और नेपाल से सटे गोरखपुर में बाहर के बड़े अपराधी आकर पनाह लेकर आपराधिक गतिविधि दूसरे जिलों में चलाते रहते हैं।
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ताजा मामला एसटीएफ से मुठभेड़ में अंबेडकरनगर के बदमाश परवेज अहमद के मारे जाने के बाद सामने आया है। पता चला है कि कैंपियरगंज के पास सफेदपोश की शरण में वह अक्सर आकर रुका करता था लेकिन वह कौन है, इसके बारे में पुलिस अभी कुछ भी बताने से बच रही है। पुलिस के जिम्मेदारों का कहना है कि मामले की छानबीन चल रही है। इससे पहले भी इस तरह के मामले सामने आ चुके हैं। 

2005 में छताई पुल पर आजमगढ़ के तीन बदमाशों को पुलिस ने ढेर कर दिया था। तब सत्ताधारी पार्टी के एक नेता का नाम शरणदाता के रूप में सामने आया था। नेता की भूमिका की जांच कौन कहे उन्होंने दमदारी से मुख्यमंत्री तक एसएसपी की ही शिकायत कर दी थी। एसएसपी रहे बीबी बख्शी को मुख्यमंत्री के सामने पेश होकर सफाई देनी पड़ी थी। फिर फाइल बंद हो गई थी।
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एकाध मामलों में अफसरों के सख्त होने पर हुई कार्रवाई

पैर पर गोली मारने जैसे हाफ एनकाउंटर में जब अफसरों ने सख्ती की तो कुछ मामलों में कार्रवाई भी की गई। एडीजी रहे जय नारायण सिंह के समय में पुलिस टीम पर हमला करने वाले मिथुन को मुठभेड़ में गोली लगी थी। तब उन्होंने खुद मानीटरिंग की थी और तीन शरणदाताओं को गिरफ्तार किया गया था। 
 
केस एक
अप्रैल 2005 में छताई पुल पर आजमगढ़ के शातिर बदमाश शिवदास यादव, नाटे समेत तीन की पुलिस से मुठभेड़ हुई थी। तीनों बदमाश मारे गए थे। तीनों  आजमगढ़ के रहने वाले थे। तब पुलिस की जांच में सामने आया था कि तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी में मंत्री रहे पैरवीकार उन्हें शरण देते थे। पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाया लेकिन शरणदाता की शिकायत पर पुलिस ही फंसने लगी तो फाइल को बंद कर दिया।

केस दो
मई 2016 में आजमगढ़ का बदमाश धर्मेंद्र यादव को खोराबार इलाके के रामनगर करजहां में एसटीएफ से मुठभेड़ में मारा गया। धर्मेंद्र ने बड़हलगंज के कुछ डॉक्टरों से रंगदारी मांगी थी। कुशीनगर होते हुए बिहार जाते समय एसटीएफ से मुठभेड़ हुई थी। उस समय भी एक शरणदाता का नाम सामने आया था। इसमें कुछ पुलिस वालों के नाम भी सामने आए थे। पुलिस वालों के कॉल तक रिकॉर्ड किए गए थे लेकिन बाद में फाइल को बंद कर दिया गया।
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