डॉ. वाणी आदित्य ने बताया कि इस बीच मधुमेह की जांच की गई तो पता चला 400 से अधिक है। इस पर पहले शुगर नियंत्रण करने के लिए इंसुलिन का इस्तेमाल किया गया। क्योंकि, शुगर की दवा से बच्चे को नुकसान पहुंच सकता था। इस पर धीरे-धीरे इंसुलिन देना शुरू किया गया। इसके बाद लेवल-टू और कलर डाप्लर की दो-दो बार जांच कराई गई।
कलर डाप्लर जांच में यह पता चला कि शुगर नियंत्रित होने की वजह से भ्रूण बढ़ रहा है और न्यूरल ट्यूब विकसित होता जा रहा है। इस ट्यूब से मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी का निर्माण करने वाली कोशिकाएं भी सही मिलीं। जबकि, जिन चार बच्चों की पहले मौत हुई थी, उनमें न्यूरल ट्यूब पूरी तरह से विकसित नहीं हो पा रहा था। इस पर नौवें महीने में सिजेरियन प्रसव कर बच्चे की जान बचाई गई। 10 दिनों तक उसकी देखभाल की गई। इसके बाद बच्चे को मां के सुपुर्द किया गया। अब बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ है।
क्या है न्यूरल ट्यूब
डॉ. वाणी आदित्य ने बताया कि कई बार गर्भवती, शुगर को नजरअंदाज कर देती हैं। जबकि, शुगर की वजह से भ्रूण में न्यूरल ट्यूब विकसित नहीं होने पाता। इस स्थिति में भ्रूण में मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी का निर्माण करने वाली कोशिकाएं विकसित नहीं हो पाती हैं। इसकी वजह से बच्चे का विकास गर्भ में नहीं होता है। कई बार समय से पहले बच्चे की मौत गर्भ में ही हो जाती है। कई बार जन्म के तत्काल बाद बच्चे की मौत होती है। ऐसे मामले बेहद कम देखने को मिलते हैं।