ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, नवरात्र में प्रारंभ के दिन के अलावा सप्तमी, अष्टमी और नवमी का भी विशेष महत्व है। सप्तमी के रात्रि में अष्टमी का योग होने से इसी दिन महानिशा पूजा का आयोजन होता है। महाष्टमी तिथि को देवी के निमित्त व्रत और सविधि पूजन किया जाता है और महानवमी के दिन पूजन और व्रत की परिपूर्ति के लिए हवन इत्यादि करके समापन किया जाता है।
21 को महानिशा पूजा 23 को होगा कन्या पूजन
ज्योतिचार्य पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार, शारदीय नवरात्र की सप्तमी तिथि 21 अक्तूबर को है। इस दिन सप्तमी तिथि का मान शाम सात बजकर 27 मिनट तक पश्चात अष्टमी है। अर्धरात्रि में अष्टमी होने से महानिशा पूजन और देवी के निमित्त बलिदानादिक क्रिया इसी दिन संपन्न की जाएगी।
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महा अष्टमी 22 अक्तूबर को है। इस दिन अष्टमी तिथि का मान शाम पांच बजकर 25 मिनट तक पश्चात नवमी तिथि है। जो श्रद्धालु अंतिम दिन व्रत और पूजन करते हैं, वे इसी दिन व्रत करेंगे। महानवमी विचार 23 अक्तूबर को है। इस दिन नवमी तिथि का मान दोपहर बाद तीन बजकर 10 मिनट तक है। इस दिन कन्याओं का पूजन और हवन संपन्न किया जाएगा।
जो व्यक्ति पूरे नवरात्र में उपवास और व्रत नहीं कर पाते हैं, वे नवरात्र के आदि में अथवा अंतिम दिन व्रत करते हैं। नौ दिन व्रत रखने वाले 22 अक्तूबर को व्रत का पारण करेंगे। दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन भी इसी दिन होगा।
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