गोरखपुर। संतान की दीर्घायु के लिए माताएं मंगलवार को हलषष्ठी व्रत रखकर भगवान बलराम की पूजा-अर्चना करेंगी। ऐसी मान्यता है कि षष्ठी देवी और भगवान बलराम की पूजा करने से व्रती के पुत्रों की आयु में वृद्धि होती है। वे स्वस्थ और निरोग रहते हैं।
वाराणसी से प्रकाशित हृषीकेश पंचांग के अनुसार, इस दिन भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि का मान संपूर्ण दिन और रात आठ बजकर 35 मिनट तक है। इस दिन भरणी नक्षत्र दिन में दो बजकर 41 मिनट तक और इसके बाद कृत्तिका नक्षत्र है। मध्याह्न में भाद्रपद कृष्ण षष्ठी होने से हलषष्ठी व्रत के लिए यह दिन प्रशस्त है। मान्यता है कि बलराम का जन्म मध्याह्न के समय ही हुआ था।
हल से जुती हुई भूमि से पैदा हुए अनाज और सब्जियां वर्जित : ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, पुत्र की दीर्घायु के लिए हलषष्ठी व्रत किया जाता है। इस दिन बलराम जयंती भी मनाई जाती है। इसे तिनछठी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत माताएं संतान की लंबी आयु के लिए रखती हैं। व्रत के दौरान कोई अन्न नहीं ग्रहण करती हैं। हलषष्ठी व्रत में हल से जुती हुई भूमि के अनाज और सब्जियों का प्रयोग वर्जित है।
बताया कि इस व्रत में वही वस्तुएं ग्रहण की जाती हैं जो तालाब या सरोवर में पैदा होती हैं या बिना जुती हुई भूमि में पाई जाती हैं। इनमें तिन्नी का चावल, कर्मुआ का साग आदि शामिल हैं। इस दिन गाय के किसी उत्पाद का प्रयोग नहीं होता है। भैंस का दूध, दही, घी का प्रयोग किया जाता है।
पूजा की विधि
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार, इस दिन घर के बाहर भैंस के गोबर से षष्ठी माता का चित्र बनाएं। उसके पश्चात गणेश-गौरी और बलराम की पूजा करें। एक छोटा सा गड्ढा बनाकर उसमें झरबेरी, पलाश और कुश का पेड़ लगाएं और वहीं बैठकर पूजा-अर्चना करें। व्रती हलषष्ठी व्रत की कथा सुनें।