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टीबी की शुरुआती पहचान: MMMUT की बड़ी खोज, SPR बायोसेंसर से शुरुआती चरण में ही पकड़ी जाएगी TB

Tue, 14 Jul 2026 11:24 AM IST
Rohit Singh निखिल तिवारी, गोरखपुर

सार

एमएमएमयूटी के इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा सरफेस प्लास्मोन रेजोनेंस (एसपीआर) बायोसेंसर का मॉडल तैयार किया है, जो रक्त के नमूने से टीबी की शुरुआती अवस्था की पहचान कर सकेगा। दावा है कि इस मॉडल से कम लागत पर तेज और सटीक टीबी जांच हो सकेगी। शोध को अंतरराष्ट्रीय माइक्रोकेमिकल जर्नल में प्रकाशित किया गया है। टीम अब इसके पेटेंट की तैयारी में है।
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डॉ अनुपम शाहू और शिवम सिंह - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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तपेदिक (टीबी) की पहचान अब शुरुआती चरण में हो सकेगी। ऐसा संभव होगा है मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमएमएमयूटी) के शोधकर्ताओं की एक खोज से। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा सरफेस प्लास्मोन रेजोनेंस (एसपीआर) बायोसेंसर का मॉडल तैयार किया है, जो रक्त के नमूने से टीबी की शुरुआती अवस्था की पहचान कर सकेगा।

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दावा है कि इस मॉडल से कम लागत पर तेज और सटीक टीबी जांच हो सकेगी। शोध को अंतरराष्ट्रीय माइक्रोकेमिकल जर्नल में प्रकाशित किया गया है। टीम अब इसके पेटेंट की तैयारी में है। टीबी की समय पर पहचान करन पाना आज भी बड़ी चुनौती है।

शुरुआती लक्षण सामान्य खांसी, बुखार और कमजोरी जैसे होने के कारण मरीज अक्सर बीमारी के तीसरे या चौथे चरण में पहुंचने के बाद ही जांच के दायरे में आते हैं। ऐसे में इलाज शुरू होने में देरी होती है। संक्रमण बढ़ने का खतरा बना रहता है। शोधकर्ताओं का दावा है कि प्रस्तावित बायोसेंसर इस समस्या का प्रभावी समाधान बन सकता है।

विभाग के सहायक आचार्य डॉ. अनुपम साहू की निर्देशन में डॉ. शिवम सिंह, एमटेक की छात्रा प्रांशी मणि त्रिपाठी और शोध छात्रा शिवांगिनी ने यह शोध किया है। इसमें गणितीय मॉडलिंग के जरिये बायोमेटेलिक मल्टीलेयर एसपीआर बायोसेंसर तैयार किया गया है।

इसमें चांदी (एजी), निकेल (एनआई), ग्राफीन और बिस्मथ फेराइट जैसी विशेष परतों का उपयोग किया गया है। इन परतों के कारण सेंसर की संवेदनशीलता बढ़ जाती है और रक्त में होने वाले बेहद सूक्ष्म बदलाव भी आसानी से दर्ज किए जा सकते हैं।

आरआई के अंतर से पता चलेगा संक्रमण
डॉ. अनुपम साहू ने बताया कि यह तकनीक रक्त के नमूने के रिफ्रेक्टिव इंडेक्स (आरआई) में होने वाले बदलावों का विश्लेषण करती है। पहले स्वस्थ व्यक्ति के रक्त का आरआई रिकॉर्ड किया जाएगा। इसके बाद टीबी संक्रमित मरीजों के अलग-अलग चरणों के नमूनों की जांच होगी।

दोनों के आरआई में अंतर के आधार पर यह पता लगाया जा सकेगा कि व्यक्ति टीबी से संक्रमित है या नहीं। यदि संक्रमित है तो वह किस चरण में है। शोध के दौरान किए गए गणितीय विश्लेषण में सेंसर ने टीबी के शुरुआती चरण के बायोमार्कर की पहचान में सबसे अधिक संवेदनशीलता दिखाई।

पेटेंट के बाद विकसित होगी माइक्रोचिप
डॉ. साहू के अनुसार, फिलहाल यह तकनीक सैद्धांतिक और गणितीय मॉडलिंग के स्तर पर विकसित की गई है। शोध प्रकाशित होने के बाद अब इसके पेटेंट के लिए आवेदन किया जाएगा। इसके बाद इसी तकनीक पर आधारित माइक्रोचिप विकसित करने की योजना है ताकि भविष्य में अस्पतालों और पैथोलॉजी केंद्रों में कम लागत पर तेज और सटीक टीबी जांच उपलब्ध कराई जा सके।
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यह शोध विश्वविद्यालय में हो रहे गुणवत्तापूर्ण और समाजोपयोगी अनुसंधान का उदाहरण है। यह तकनीक टीबी की शुरुआती पहचान को अधिक सुलभ और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। टीम को इस उपलब्धि के लिए बधाई और शुभकामनाएं: प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा, कुलपति, एमएमएमयूटी
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