संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। बड़ी से बड़ी बीमारियों के इलाज के लिए जरूरी औषधियां हमारे आसपास मौजूद रहती हैं, लेकिन हम उन्हें पहचान नहीं पाते। गोरखपुर और उसके आसपास के इलाकों में ऐसी बहुत सारी औषधियां मौजूद हैं जिनसे गंभीर बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। आज तेजी से हो रहे विकास कार्य और शहरीकरण की वजह से जंगलों की कटाई को रही है। इससे वे औषधियां भी विलुप्त हो सकती हैं।
इन महत्वपूर्ण वनस्पतियों के संरक्षण के निए भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के बॉटनी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. विरेंद्र मधुकर को जिम्मेदारी दी है। उन्होंने विभाग के बॉटेनिकल गार्डन में एक हर्बल मेडिसिनल गार्डन बनाया है जिसमें तराई क्षेत्र की सभी महत्वपूर्ण वनस्पतियों को संरक्षित किया गया है।
इन वनस्पतियों को संरक्षित करने के लिए उन्हें आयुष मंत्रालय के नेशनल मेडिकल प्लांट बोर्ड से 21.60 लाख रुपये का फंड भी मिला है। डॉ. वीरेंद्र ने बताया कि इस हर्बल मेडिसिनल गार्डन को बनाने का मकसद तराई क्षेत्र की सभी महत्वपूर्ण वनस्पतियों को संरक्षित करना है। जैसे-जैसे शहर का विकास हो रहा है वैसे ही पेड़-पौधों की कटाई भी हो रही है। अगर इन महत्वपूर्ण वनस्पतियों को संरक्षित नहीं किया गया तो आगे आने वाले समय में हमें गंभीर रोगों से बचाने के लिए दवा नहीं बन पाएगी। उन्होंने बताया कि महाराजगंज के निचलौल इलाके में मधुमेह से लेकर न्यूरो और बुखार के इलाज के लिए कई औषधि मौजूद हैं।
बुखार से लेकर मधुमेह की औषधि मौजूद
हर्बल मेडिसिनल गार्डन में बुखार, मधुमेह, न्यूरो, डिप्रेशन जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में आने वाली औषधियां संरक्षित हैं। जिसमें चिरायता, सुदर्शन, मंडूपकपर्णी, सर्पगंधा, अश्वगंधा, शतावरी, रत्ती, जिमिकंद, केवांच, तेजपत्ता, पनियाला, हरड, बालमखीरा, खिरनी, श्योनक, करंज आदि शामिल हैं। इन्हीं पौधों की मदद से दवा कंपनियां दवाओं का निर्माण करती हैं। डॉ. विरेंद्र ने बताया कि ये वनस्पतियां शहर में शायद ही देखने को मिलें। ज्यादातर ये जंगलों में ही पाई जाती हैं।