छह दिन हो गए साइकिल चलाते। बस रात में हाइवे किनारे कहीं आराम करते हैं। सबके पैरों में दर्द है। रास्ते में मील के पत्थरों और बोर्ड को देखते चल रहे हैं, ताकि दूरी और दिशा का एहसास रहे। मजदूरों ने बताया कि अभी जितनी दूर चलकर पहुंचे हैं, उससे भी ज्यादा दूरी तय करनी है।
घर पहुंचने में अभी और कितने दिन लगेंगे, नहीं मालूम। इन्हीं के एक साथी अनेश मंडल ने पुरानी सी दिख रही साइकिल की ओर इशारा करते हुए बताया कि उनके पास सिर्फ दो हजार रुपये थे, दो हजार एक साथी से कज़ॱर लेकर इसे खरीदा है।
अनेश के मुताबिक, दिल्ली और नोएडा में कई लोग जरूरतमंदों को अपनी पुरानी साइकिलें मनचाही कीमत में बेच रहे हैं। जिन मजदूरों के पास रकम है, वे साइकिल खरीदकर जैसे-तैसे घरों के लिए निकल रहे हैं।
आपबीती सुनाते अनेश भावुक हो गए, ‘कर्ज से मुक्ति पाने के लिए घर-परिवार छोड़ा था, अब उसी घर-परिवार में लौटने के लिए और कर्जदार हो गया।’ रास्ते में खाने-पीने के सवाल पर दिकेश मंडल की आंखें भर आईं और अल्फ़ाज थे, ‘यूपी में कुछ जगहों पर मदद करने वाले बाबू मोशाय लोग मिले, जो हमारी तरह आ रहे लोगों को खाना खिला रहे हैं, तो कुछ जगहों पर हम लोग स्थानीय लोगों से खाना-पानी मांग ले रहे हैं।’