महराजगंज। माइक्रो फाइनेंस कंपनी से कर्ज लेना समूह की महिलाओं के जी का जंजाल बन गया है। इसमें एक बार जो फंसा तो उससे उबरने के लिए आशियाना तक बेचना पड़ा। वहीं वसूली एजेंटों की धमकी और अपशब्द भी सहने पड़े।
त्रस्त महिलाओं को जमीन बेचकर पीछा छुड़ाना पड़ा। पनियरा क्षेत्र के बैदा गांव की उर्मिला ने बताया कि अब तो मेहनत मजदूरी करके गुजर बसर कर लूंगी, लेकिन माइक्रो फाइनेंस कंपनी से कर्ज नहीं लूंगी।
उन्होंने एक साल पहले की घटना का जिक्र किया तो आंख भर गईं। बताया कि एजेंट रोजाना घर आते थे। पास में रकम नहीं होने पर गांव में दूसरे के घर चली जाती थी। समूह में तमाम महिला शामिल थीं। इसमें 50-50 हजार तीन कंपनी से कर्ज ली। पति ईंट-भट्ठे पर ट्रैक्टर चलाते हैं। स्वयं भी मजदूरी करती हूं। उन्होंने बताया कि एक साल पहले वसूली एजेंट ने त्रस्त कर दिया।
इसके बाद पति ने 25 डिस्मिल जमीन बेचकर कर्ज जमा किया। कर्ज के चक्कर में पूरी जमीन बिक गई। अब तो किसी तरह से मजदूरी करके काम चल रहा है। गांव में इसी तरह से अन्य महिलाएं भी परेशान हैं। अब तो किसी को ऐसी कंपनियों से कर्ज लेने के लिए मना करती हूं। इसी गांव में आगे बढ़ने पर आरती देवी मिलीं। उन्होंने भी अपना दर्द साझा किया। बताया कि कहा कि 15 डिस्मिल खेत बिक चुका है। करीब पांच डिस्मिल खेत बचा है। पति की दो साल पहले मौत हो चुकी है।
तबीयत खराब हो गई थी। इलाज कराने के लिए पास में रकम नहीं थी तो करीब डेढ़ लाख रुपये कर्ज लेकर इलाज कराई। हालत यह हुई की पति की मौत हो गई और कर्ज बढ़ता गया। बेटा जयहिंद भारती गोरखपुर में मजदूरी करता है। इससे घर का खर्च चलता है। उन्होंने बताया कि खेत बिकने के बाद जो रकम मिली, उसी से पूरा कर्ज जमा कर दी। गुजरे वक्त में वसूली करने वाले एजेंट रोजाना घर आकर बैठ जाते थे।
अनुरोध करने पर भी कुछ नहीं सुनते थे। इनके घर के पास ही इसरावती देवी मिलीं। उन्होंने बताया कि कंपनी से 90 हजार कर्ज लिया गया गया था। इसे चुकाने में पांच डिस्मिल जमीन सड़क के किनारे बिक गई। पति गांव में गुमटी में दुकान करते हैं।
तीन बेटे हैं। कर्ज भी अभी 30 हजार रुपये जमा नहीं हुआ है। ब्याज समझ में नहीं आ रहा है। किस्त जमा करने पर भी रकम बढ़ती जा रही है। वहीं वसूली करने वाले एजेंटों का व्यवहार ठीक नहीं है। समूह में कर्ज लेने वाली सभी महिलाएं परेशान रहती हैं। एजेंट आते हैं और रकम नहीं मिलने पर खरी-खोटी सुनाकर चले जाते हैं। गांव की गुड़िया देवी ने भी कर्ज के बाद होने वाली दुश्वारियां बताईं। उन्होंने बताया कि कर्ज चुकाने में छह डिस्मिल जमीन बेचनी पड़ी।
पति जितेंद्र ट्रक चालक हैं। कई बार में डेढ़ लाख रुपये कर्ज ली। जमा भी हो चुका है। अभी करीब 30 हजार बाकी है। इसके लिए भी वसूली करने वाले एजेंट दबाव बनाते रहते हैं। उनको कई बार समझाने का प्रयास की, लेकिन वे सुनने को तैयार नहीं हाेते हैं। माइक्रो फाइनेंस कंपनी से कर्ज आसानी से मिल जाता है, लेकिन बाद में परेशानी बढ़ जाती है। इसी गांव की नीला देवी ने बताया कि 24 डिस्मिल खेत बिका है।
दो लाख कर्ज लेकर बेटी की शादी की थी। पति इंद्रभान ट्रैक्टर चलाते हैं। खेत बेचकर रकम जमा की, लेकिन अभी करीब 20 हजार रुपये जमा नहीं हुए हैं। उसे भी जमा करने की व्यवस्था कर रहीं हूं। मंसूरगंज की जानकी देवी बेटी की शादी के लिए 50 रुपये एक साल पहले कर्ज ली। उन्होंने बताया कि किस्त जमा करने में परेशानी हो रही है।