तेंदुआ को गंभीर घायल अवस्था में लाया गया था गोरखपुर चिड़ियाघर।
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उत्तर प्रदेश के महराजगंज से रेस्क्यू कर लाए गए तेंदुए के गले की नस कट गई थी। इसकी वजह से पशु चिकित्साधिकारियों की टीम को उसे बचाने के लिए बहुत वक्त नहीं मिल सका। टीम की लाख कोशिशों के बाद भी तेंदुए को बचाया न जा सका। गोरखपुर के प्राणि उद्यान में इलाज शुरू होने के दस मिनट बाद ही तेंदुए की मौत हो गई।
शुक्रवार की रात 10 बजे महराजगंज प्रभाग की टीम तेंदुए को लेकर प्राणि उद्यान के पशु अस्पताल पहुंची थी। तेंदुए के गले में फंसे तार (क्लच वायर) को बाहर निकालकर ऑक्सीजन लगाया गया। उपचार शुरू होने के 10 मिनट बाद ही तेंदुए की मौत हो गई।
पशु चिकित्साधिकारी डॉ. योगेश प्रताप सिंह ने बताया कि तेंदुए के गले की नस कटने की वजह से उसे सांस लेने में बहुत दिक्कत हो रही थी।
दरअसल, वन्य जीवों को पकड़ने के लिए जंगलों में जाल बिछाया जाता है। इसके तहत जंगल में कई स्थानों पर गड्ढा खोदकर क्लच वायर से घेरा बनाया जाता है। इसके ऊपर से मिट्टी और पेड़ के पत्तों का जाल बनाकर इसे छिपा देते हैं।
अक्सर इसका प्रयोग जंगली सुअर और अन्य वन्य जीवों को पकड़ने के लिए किया जाता है। इसी जाल में तेंदुआ भी फंस गया था। इसकी वजह से उसके गले में घाव बन गया। शुरू के पांच-छह दिन उसे पशु चिकित्सालय में नहीं लाया जा सका। इससे उसके जख्म पर कीड़े लग गए। कीड़ों ने सांस की नली को सड़ाकर क्षतिग्रस्त कर दिया था।
इसी बीच शुक्रवार को महराजगंज की टीम रात 10 बजे तेंदुए को लेकर चिड़ियाघर पहुंची थी। पशु चिकित्साधिकारी ने बताया कि अगर कुछ घंटे पहले तेंदुए को अस्पताल लाया जाता तो उम्मीद थी कि उसकी जान बचाई जा सकती थी। शनिवार को तीन डॉक्टरों की टीम ने उसका पोस्टमार्टम किया। इसके बाद प्राणि उद्यान पशु अस्पताल के इलेक्ट्रॉनिक मशीन से उसका अंतिम संस्कार किया गया।