लोकरंग कार्यक्रम में प्रस्तुति देती कलाकार।
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गोरखपुर महोत्सव के लोकरंग कार्यक्रम मे कलाकारों ने लोक गीतों के जरिए पूर्वांचल की संस्कृति और मिट्टी की महक से रूबरू कराया तो दर्शक झूम उठे। अधिकतर स्थानीय कलाकारों ने लोक गीतों के जरिए ग्रामीण समाज के ताने बाने और परंपराओं को बयान किया। आप बीती से लगने वाले यह इन लोक गीतों पर दर्शक मंत्रमुग्ध से नजर आए।
स्थानीय लोक गायक राकेश उपाध्याय ने बाबा गोरखनाथ के खिचड़ी मेले को समर्पित गीत लागल बाटे खिचड़ी का मेला, गोरी चलो मेला घुमाय दें सुनाया तो दर्शकों ने बाबा गोरखनाथ के जयकारे लगाकर उनका उत्साह वर्धन किया। इसके बाद उन्होंने कुइंयां में ठंडा पानी पीपल की छांव रे सुनाकर ग्रामीण जीवन शैली से रूबरू कराया।
शहर की लोक गायिका रंजना श्रीवास्तव ने नकटा विधा के गीत गाए तो पंडाल तालियों से गूंज उठा। ग्रामीण महिलाओं की सकुचाहट को दर्शाता गीत जाना है बजरिया के बीच, बलम कोई फोटो न खींचे गाया इसका आनंद सभी दर्शकों ने लिया। इसके बाद सइंया बड़ा बेईमान हमरी कदरिया न जाने गाकर ग्रामीण परिवार की महिला की व्यथा बयान कर महिला श्रोताओें को गुदगुदाया।
स्थानीय लोक गायक विजय शंकर विश्वकर्मा ने सीमा पर तैनात सैनिक के परिवार के नाम वीर रस में लिखे गए पत्र को गीत के रूप में सुनाया पतिया में लिखले बाणे रण के बयान, पतिया हनि हनि मोर सुनाया तो युवा वर्ग जोश से भर गया। गीत के दौरान पंडाल में भारत माताकी जय के नारे गूंजे तो माहौल देश भक्तिमय हो गया।
स्थानीय लोक गायिका दीक्षा द्विवेदी ने सोहर बबुआ हमार महराज होई हैं प्रस्तुत कर ग्रामीण संस्कृति की झलक प्रस्तुत की। उन्होंने कई विधाओं को जोड़ते हुए गीत प्रस्तुत किया। गोपालगंज के भोजपुरी गायक सुमित पांडेय ने कजरी गीत गावा कजरिया न प्रस्तुत कर दर्शकों को लुभाया। कार्यक्रम का संचालन शिवेंद्र पांडेय ने और संयोजन राकेश श्रीवास्तव ने किया।