- सीईटीपी के लिए लगभग सात साल पहले गीडा प्रशासन ने अधिग्रहित की थी जमीन
- बस्ती से लेकर संतकबीरनगर और गोरखपुर में कई जगहों पर नालों का गंदा पानी गिरता है आमी में
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। आमी नदी की गंदगी की शिकायत का मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में पहुंचने के बाद एक बार फिर लोगों में उम्मीद जगी है। एनजीटी इस मामले में 12 जनवरी को सुनवाई करेगा। इससे पहले चौंकाने वाला मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि जो जमीन कॉमन इंफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) के लिए खरीदी गई थी, वहां खेती कराई जा रही है।
आमी नदी की स्वच्छता को लेकर जन आंदोलन और एनजीटी के आदेश को देखते हुए वर्ष 2016-17 में गीडा में जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की गई थी। उस जमीन पर 15 एमएलडी की सीईटीपी स्थापित होने की बात शुरू में कही गई थी। बाद में नमामि गंगा योजना के तहत चार एमएलडी का सीईटीपी बनाने का निर्णय लिया गया। अब तक वह भी नहीं लगी। इसे लेकर प्रक्रिया काफी समय से लंबित है। इसके अलावा सीईटीपी लगाने के लिए प्रदूषण बोर्ड ने नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) को भी पत्र लिखा है।
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गीडा की स्थापना के समय ही बननी थी सीईटीपी
गीडा की स्थापना वर्ष 1989 में हुई थी। मानक के अनुसार वर्ष 1989 में ही वहां सीईटीपी की स्थापना हो जानी थी लेकिन गीडा की स्थापना के 36 साल बाद भी यह नहीं हो सका।
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यह है मामला
देवरिया जिले के गौरी बाजार निवासी पर्यावरण कार्यकर्ता अनिल पांडेय ने एनजीटी में आमी नदी के प्रदूषण की शिकायत की है। इस मामले में छह अक्तूबर को एनजीटी में सुनवाई हुई। इसके बाद एनजीटी ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), उप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) और गोरखपुर के डीएम से मामले की जांच कराकर रिपोर्ट देने को कहा है। इस मामले में अगली सुनवाई 12 जनवरी को होगी। उससे पहले इन विभागों को मिलकर जांच कर अपनी रिपोर्ट तैयार करनी है।
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बदबू करता है आमी का पानी
एनजीटी में शिकायत करने वाले अनिल पांडेय ने बताया कि आमी का पानी दूर से ही बदबू करता है। बिना शोधन के जगह-जगह आमी में पानी छोड़ा जा रहा है। सरया नाला के जरिये गीडा का पानी आमी में छोड़ा जा रहा है। गोरखपुर, बस्ती और संतकबीरनगर जिलों के कई जगहों पर गंदा पानी आमी नदी में आता है।
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16 वर्षों से संघर्ष कर रहा ''''आमी बचाओ मंच''''
आमी बचाओ मंच के अध्यक्ष विश्व विजय सिंह कहते हैं, वर्ष 2009 में संगठित तौर पर मंच ने संघर्ष शुरू किया था। वर्ष 2011 में सीपीसीबी ने माना कि आमी गंदी है। उससे पहले तो प्रशासन आमी को प्रदूषित मानता ही नहीं था। आमी बचाने के लिए तीन बार सोहगौरा से डुमरियागंज के शिकहरा तक पदयात्रा निकाली गई। एनजीटी में यह मामला अभी भी लंबित है। एनजीटी के आदेश के बाद कॉमन इंफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) लगाने के लिए वर्ष 2016-17 में 11 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी। उस जमीन पर अब गीडा प्रशासन खेती करा रहा है। अब तक यहां सीईटीपी स्थापित नहीं हो सकी है।
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बोले ग्रामीण
कोट
1992-93 से ही आमी में दूषित पानी गिराने को लेकर समय-समय पर विरोध होता रहा है। नेताओं ने भी आवाज उठाई लेकिन आमी में गंदा पानी गिरना बंद नहीं हुआ। छह साल पहले ट्रीटमेंट प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण हुआ। अब उस जगह पर खेती कराई जा रही है।
- रणधीर सिंह, समाजसेवी, अड़िलापार
कोट
आमी नदी के प्रदूषण को लेकर दर्जनों बार धरना-प्रदर्शन हुआ। हर बार प्रशासन आश्वासन देकर कोरम पूरा कर लेता है। जनता इसकी वजह से विभिन्न बीमारियों का शिकार हो रही है। नदी के आसपास बसे गांवों के लोगों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
- चंदन सिंह, ग्राम प्रधान, खरैला
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वर्जन
नमामि गंगे योजना के तहत गीडा में सीईटीपी लगाने के लिए नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) को पत्र लिखा गया है। उम्मीद है कि जल्द ही ट्रीटमेंट प्लांट लग जाएगा।
- राम मिलन वर्मा, वैज्ञानिक सहायक, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड