आइसक्रीम बनाने के कारखानों पर जहां भी छापा पड़ा, वहां दूध-मलाई एक छटाक नहीं मिला। बल्कि, हर जगह केमिकल ही पाए गए। राजस्थान और हरियाणा से आने वाले कारीगर यहां छह महीने रहकर आइसक्रीम बनाते हैं। इसके लिए वे मिल्क पाउडर और कृत्रिम वनस्पति वसा (फ्रोजन डेजर्ट) का इस्तेमाल करते हैं।
गर्मी से राहत दिलाने वाली स्वादिष्ट आइसक्रीम सबको भा रही है। युवा और बच्चों में तो इसकी दीवानगी इस कदर है कि रात की पार्टी इसके बिना अधूरी है। लेकिन, आइसक्रीम की बढ़ती खपत ने धंधेबाजों को मिलावट का एक और मौका दे दिया है। बाजार में बिकने वाली आइसक्रीम में से कुछ बड़े ब्रांड को छोड़ दें तो अधिकांश में मिलावट है। शहर के हर मोहल्ले में किसी न किसी नाम से आइसक्रीम बनाने की फैक्टरी चल रही है।
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आइसक्रीम के कारोबार से जुड़े रजनीश जायसवाल ने बताया कि बाजार में 10 रुपये की कैंडी से लेकर 250 रुपये तक की आइसक्रीम उपलब्ध है। औसतन हर दिन करीब 40 लाख रुपये की आइसक्रीम लोग खा रहे हैं।
इसकी सबसे अधिक खपत गोलघर और रामगढ़ताल इलाके के नौका विहार में होती है। अब तो शहर में कई जगह आइसक्रीम प्वाइंट बन गए हैं, जहां शाम ढलते ही लोग परिवार के साथ आइसक्रीम खाने जाते हैं। आइसक्रीम के बढ़ते शौकीनों को देखते हुए धंधेबाजों ने भी अपना जाल बिछा दिया है। पिछले दिनों नौसड़ समेत पूरे शहर में अभियान चलाकर दर्जन भर फैक्टरियों और दुकानों से जांच के लिए नमूने लिए गए।
दूध-मलाई की जगह फ्रोजन डेजर्ट
आइसक्रीम बनाने के कारखानों पर जहां भी छापा पड़ा, वहां दूध-मलाई एक छटाक नहीं मिला। बल्कि, हर जगह केमिकल ही पाए गए। राजस्थान और हरियाणा से आने वाले कारीगर यहां छह महीने रहकर आइसक्रीम बनाते हैं। इसके लिए वे मिल्क पाउडर और कृत्रिम वनस्पति वसा (फ्रोजन डेजर्ट) का इस्तेमाल करते हैं।
आइस कैंडी बनाने के लिए जिस बर्फ का इस्तेमाल होता है, वह इतने गंदे जगह रखी होती है कि उसे देखकर खाने की इच्छा मर जाती है। पिछले दिनों नौसड़ के जिस कारखाने में छापा मारा गया, वहां इतनी गंदगी थी कि छापा मारने वाली टीम भी हैरत में पड़ गई।
बुरा असर डालती है ये आइसक्रीम
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. डीके सिंह ने बताया कि बाजार में बिकने वाली आइसक्रीम सबसे अधिक नुकसान बच्चों का ही करती है। क्योंकि इसमें पड़ी चॉकलेट व सैकरीन बच्चों के दांत में फंस जाती है। इससे दांतों में सड़न की समस्या आने लगती है। इसका सीधा असर बच्चों के पाचन क्रिया पर पड़ता है।
पेट दर्द, दस्त, उल्टी जैसी समस्याएं भी होती हैं। अक्सर ओपीडी में ऐसे बच्चे आते हैं, जिनके इलाज के लिए जब हिस्ट्री तलाशी जाती है तो पता लगता है कि बच्चा स्कूल से निकलते ही आइसक्रीम खाने का आदी हो गया है। अभिभावक उन्हें दुलार में आइसक्रीम खिलाते हैं और बदले में बच्चा बीमार पड़ता है।
आइसक्रीम में मिलावट व गंदगी की शिकायत आम है। पिछले दिनों एक आइसकैंडी में ब्लेड मिलने की भी शिकायत आई थी। इसके बाद अभियान चलाकर पूरे जिले में आइसक्रीम बनाने वाली फैक्टरियों व उनकी बिक्री करने वाली दुकानों की जांच कर नमूने लिए गए। लोगों को भी ध्यान रखना चाहिए कि जो खा रहे हैं, उसकी गुणवत्ता कैसी है: डॉ. सुधीर कुमार सिंह, सहायक आयुक्त खाद्य सुरक्षा