अभी छह महीने नहीं छूटेगा अवैध निर्माण का दाग
गोरखपुर। प्रदेश में अवैध निर्माण के मामले में दूसरे पायदान पर रहने का दाग अभी गोरखपुर के माथे पर छह महीने से अधिक समय तक चस्पा रह सकता है। गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) इसके स्थायी समाधान में जुटा है, मगर प्राधिकरण की नई महायोजना 2031 लागू होने के बाद ही ये दाग धुल सकेगा। महायोजना 2031 में विनियमित क्षेत्र में बने घरों के मानचित्र भी स्वीकृत हो सकेंगे। फिलहाल महायोजना तैयार करने का काम चल रहा है। दिसंबर से जनवरी तक इसके पूरा होने की उम्मीद है। हालांकि थोड़ी राहत वाली बात यह है कि शासन की तरफ से ढाई साल पहले जो समीक्षा की गई थी, उसमें अवैध निर्माण के मामले में गोरखपुर पहले पायदान पर था। इस बार की समीक्षा में प्रयागराज पहले पायदान पर है।
दरअसल, अवैध निर्माण के लिए जीडीए के अभियंता और अफसर तो जिम्मेदार हैं ही, प्राधिकरण क्षेत्र में आने वाली करीब 1700 एकड़ विनियमितीकरण की जमीन भी बड़ी वजह है, जहां हजारों मकान खड़े हो गए हैं। वर्तमान महायोजना 2021 में करीब 20 फीसदी एरिया को विनियमित क्षेत्र घोषित कर दिया गया था। यहां मानचित्र नहीं स्वीकृत हो सकते। अभियंताओं और अफसरों की लापरवाही से इस विनियमित क्षेत्र में पिछले ढाई दशक में 12 हजार से अधिक निर्माण हो गए हैं, जो वर्तमान में कुल 22 हजार अवैध निर्माण के आधे से भी अधिक हैं। इनमें कुछ कॉलोनियां तो ग्रीन लैंड पर बस गई हैं। ये अवैध निर्माण जीडीए के लिए मुसीबत बन गए हैं। जीडीए अब अगर इन अवैध निर्माण के खिलाफ सख्ती करना भी चाहे तो कार्रवाई आसान नहीं होगी। मोहल्ले के मोहल्ले जमींदोज करने पड़ेंगे।
60 फीसदी मानचित्र के आवेदन रद्द करने पर बैठ चुकी है जांच
करीब चार साल पहले प्रदेश में सबसे ज्यादा अवैध निर्माण के साथ ही जीडीए द्वारा मानचित्र के सबसे ज्यादा 60 फीसदी आवेदन निरस्त करने के मामले में शासन ने एक जांच कमेटी गठित की थी। कमेटी के सदस्यों ने दो दिन यहां रहकर मामले की जांच की। जांच में यह पाया गया था कि विनियमितीकरण क्षेत्र के ज्यादातर आवेदन आने की वजह से निरस्त होने वाले आवेदनों की संख्या अधिक है। इस मामले में जीडीए को शासन से क्लीन चिट मिल गई थी।
बोर्ड बैठक में हुआ फैसला, अब शासन को नहीं भेजेंगे मामला
विनियमितीकरण की जमीन को नियमित करने के लिए पिछले एक दशक से जीडीए कई बार शासन को पत्र लिख चुका है, मगर कोई सुनवाई नहीं हुई। तीन सितंबर को हुई जीडीए की बोर्ड बैठक में यह फैसला किया गया कि अब शासन को पत्र लिखने की बजाए निर्माणाधीन नई महायोजना 2031 में ही ऐसे प्रावधान किए जाएं कि पूरी अवैध कॉलोनी को वैध करने के बजाए एक-एक अवैध निर्माण को दंड शुल्क वसूल कर उसके मानचित्र स्वीकृत किए जाएं।
मानचित्र स्वीकृत करने में देरी भी बड़ी वजह
साल भर पहले ही शासन की तरफ से मानचित्र स्वीकृत करने के तय समय को लेकर सख्ती की गई, वर्ना इसके पहले मानचित्र के लिए आवेदकों को छह-छह महीने दौड़ाया जाता था। मानचित्र के नाम पर अभियंता वसूली करते थे। यह भी एक बड़ी वजह है कि आम आदमी चाहकर भी मानचित्र स्वीकृत कराने से कतराता है। पिछले छह महीने से तो ऑनलाइन आवेदन के लिए बनी वेबसाइट में ही तकनीकी दिक्कत से तमाम आवेदक परेशान हैं। पुरानी वेबसाइट बंद हो जाने से मानचित्र स्वीकृत होने के बाद भी 70 से अधिक लोग शुल्क जमा करने के लिए महीनों से परेशान हैं।
... तो अवैध कॉलोनियों की फाइल फिर धूल फांकने को छोड़ दी गई
जीडीए ने एक बार फिर सर्वे कर 153 अवैध कॉलोनियों की सूची तैयार की थी। 15 दिन पहले प्राधिकरण ने रेरा को सूची भेज दी, मगर अभी कोई कार्रवाई नहीं हुई। वहीं, जीडीए को भी संबंधित अभियंताओं पर कार्रवाई करनी थी। वह भी नहीं हुई। हर बार ऐसा ही होता है। सूची बनती तो है, मगर फिर धूल फांकने के लिए छोड़ दी जाती है। पिछले साल जीडीए ने सर्वे कर एक सूची तैयार की, जिसमें करीब 70 अवैध कॉलोनियां थीं, जिनकी संख्या साल भीतर ही बढ़कर 153 पहुंच गई।
गोरखपुर में अवैध निर्माण के अधिकतर मामले विनियमितीकरण क्षेत्र के हैं। ज्यादातर मामले पुराने हैं। विनियमितीकरण क्षेत्र की जमीन पर हुए निर्माण का मानचित्र नहीं स्वीकृत किया जा सकता। मगर इसका समाधान नई महायोजना में हो जाएगा। निर्धारित शुल्क लेकर मानचित्र स्वीकृत किए जा सकेंगे। अवैध कॉलोनियों के मामले में रेरा को जो सूची भेजी गई थी, उसके संबंध में उन्होंने और जानकारी मांगी है। वर्तमान में ज्यादातर अवर अभियंता कोरोना संक्रमित हैं। उनके स्वस्थ होते ही सूचना रेरा को भेज दी जाएगी।
- अनुज सिंह, उपाध्यक्ष