सिर्फ नगर निगम के आंकड़ों पर गौर करें तो महज 12 साल में ही शहर के क्षेत्रफल में 80 वर्ग किलोमीटर से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2011 में शहर का क्षेत्रफल 145.5 वर्ग किलोमीटर था जो अब बढ़कर 222.6 वर्ग किलोमीटर हो गया है। बढ़े हुए दायरे को ही देखते हुए पिछले साल 32 गांवों को नगर निगम में शामिल कर लिया गया। हालांकि यह दायरा और बढ़ गया है। चारों तरफ शहर की सीमा बढ़ी है।
करीब डेढ़-दो दशक पहले तक पूरब दिशा में रामगढ़ताल के बाद यानी सहारा इस्टेट के बाद से गांव शुरू हो जाते थे जो अब कॉलोनियों का रूप ले चुके हैं। देवरिया रोड तक सड़क के दोनों तरफ एक-एक किलोमीटर से अधिक के दायरे में कॉलोनियां बस चुकी हैं। इसी तरह पश्चिम दिशा में सहजनवां तक शहर बस चुका है तो वहीं दक्षिण में जहां पहले नौसड़ के आगे से ही गांव का ग्रामीण परिवेश दिखने लगता था, अब पांच किलोमीटर आगे तक कॉलोनियां दिखाई पड़ रही हैं। उत्तर दिशा में भी मेडिकल रोड पर शहर का दायरा गुलरिहा के आगे तक तो गोरखनाथ रोड पर बालापार के आगे तक शहरी परिवेश दिखाई पड़ रहा है।
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ये गांव हाल ही में निगम में शामिल हुए
सिक्टौर तप्पा हवेली, रानीडीहा, खोराबार उर्फ सूबा बाजार, जंगल सिकरी उर्फ खोराबार, भरवलिया बुजुर्ग, कजाकपुर, बड़गो, मनहट, गायघाट बुजुर्ग, पथरा, बाघरानी, गायघाट खुर्द, सेमरा देवी प्रसाद, गुलरिहा, मुंडिला उर्फ मुंडेरा, मिर्जापुर तप्पा खुटहन, करमहा उर्फ कम्हरिया, जंगल तिकोनिया नंबर-1, जंगल बहादुर अली, नुरुद्दीन चक, चकरा दोयम, रामपुर तप्पा हवेली, सेंदुली बिंदुली, कठवतिया उर्फ कठउर, पिपरा तप्पा हवेली, झरवा, हरसेवकपुर नंबर दो, लक्ष्मीपुर तप्पा कस्बा, उमरपुर तप्पा खुटहन, जंगल हकीम नंबर-2
समझदारी से निवेश कर आने वाली पीढ़ी का भी बना सकते हैं भविष्य
आर्किटेक्ट आशीष श्रीवास्तव ने कहा कि जमीन से लोगों की भावनाएं जुड़ी रहती हैं। इसलिए, बहुत से लोग इसे बेचते नहीं हैं। मगर इससे नई या आने वाले पीढ़ी को कोई लाभ नहीं मिलेगा। यदि किसी के पास विशेषकर शहर से सटे क्षेत्रों में अतिरिक्त जमीन है तो वह उसे बेचकर समझदारी से निवेश करे तो वही नहीं उसकी आने वाली पीढ़ी भी तरक्की की राह पर दौड़ सकेगी।
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कहा कि मसलन यदि प्राधिकरण या गीडा उद्योग के लिए जमीन अधिगृहीत करती है या फिर कोई कॉलोनाइजर वहां आवासीय या व्यावसायिक प्रोजेक्ट लाना चाहता है तो जमीन से मिले रुपये से उसी प्रोजेक्ट में खुद के रहने के लिए एक-दो फ्लैट सुरक्षित रखने के साथ ही क्षमता अनुसार दो-तीन या चार फ्लैट और लिए जा सकते हैं। जिसे किराए पर उठा देने पर संपत्ति तो अपनी बनी ही रहेगी, किराए से नियमित आय का जरिया भी तैयार हो जाएगा। इसी तरह छोटी-छोटी निर्माण इकाई खोलकर भी आय का नियमित साधन जुटाने के साथ ही कई लोगों को रोजगार भी दिए जा सकते हैं।