आजादी के पहले करीब वर्ष 1900 के आसपास के समय ट्रेन में फर्स्ट क्लास में सफर करने वाले का अलग ही सम्मान होता था। फर्स्ट क्लास का इतना रुतबा था कि ट्रेन के रुकने पर हेड टीटीई आकर डिब्बे में सलाम करते थे।
भोजनालय में इतना स्वादिष्ट खाना बनता था कि शहर से लोग डबल रोटी लेने ट्रेन तक जाया करते थे। यही नहीं बूट पालिश करने के लिए मोची और शेविंग के लिए नाई भी उपलब्ध होते थे। फर्स्ट क्लास कोच में अंग्रेज अफसर, जमींदार या कोई बड़ा आदमी ही सफर करता था।
बता दें कि पूर्वोत्तर रेलवे में 1887 में ट्रेनों के अंदर सैलून लगने लगी थी। बेतिया महाराज (बेतिया बिहार में है) ने रेलवे से सैलून की मांग की थी। राजा की इच्छा के अनुसार सैलून के अंदर की डिजाइन तैयार की गई थी।