जानकारी के मुताबिक, कोतवाली क्षेत्र के दीवान बाजार के रहने वाले राजेंद्र प्रसाद अग्रहरि का बेटा राजकुमार 26 जनवरी 2007 की रात में डीएवी काॅलेज से बहूभोज कार्यक्रम से घर लौट रहा था। वह मीनार मस्जिद मोड़ के पास पहुंचा था कि सामने से निजामपुर का मोहर्रम जुलूस आ रहा था।
जुलूस के साथ चल रहे तिवारीपुर क्षेत्र के निजामपुर निवासी शमीम और अन्य ने चाकू, तलवार व लात-मुक्कों से हमला कर राजकुमार को बुरी तरह से घायल कर दिया। उसे मेडिकल काॅलेज में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई थी। राजकुमार की हत्या की खबर के बाद तनाव फैल गया। गोरखपुर में दंगा भड़कने की वजह यहीं हत्या बनी।
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राजकुमार के पिता राजेंद्र ने मोहम्मद शमीम, उसके पिता व अन्य के खिलाफ केस दर्ज कराया था। पुलिस ने आरोपी बनाए गए पिता-पुत्र को जेल भेजा, जबकि पांच अन्य नाबालिग को बाल सुधार गृह भेजा गया। कोर्ट में सुनवाई के दौरान नाबालिग को उम्र का फायदा मिला, लेकिन मुख्य आरोपी बनाए गए पिता-पुत्र को सजा सुनाई गई।
16 अगस्त 2007 को कोर्ट से जमानत मिलने के बाद शमीम फरार हो गया था। तभी से उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी हो रहा था। हत्या के मामले में 10 अक्तूबर 2012 में कोर्ट ने उसके पिता को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। शमीम नाम बदलकर चेन्नई में रहने लगा था। गोरखपुर में आता तो यहां भी किराये के मकान में रहता था। पुलिस ने शमीम को निजामपुर स्थित उसके घर से बीते 14 सितंबर में गिरफ्तार किया था।
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जिला शासकीय अधिवक्ता प्रमोद कुमार मौर्य ने कहा कि पुलिस ने इस प्रकरण में पिता-पुत्र को मुख्य आरोपी बनाया था। पिता को पहले ही आजीवन कारावास की सजा हो चुकी थी, लेकिन बेटा फरार था, इस वजह से उसे सजा नहीं हो पाई। आरोपी शमीम के गिरफ्तार होने के बाद कोर्ट में पैरवी की गई। इसके बाद मंगलवार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। इस मामले में पांच नाबालिग आरोपी भी थे, कानून के हिसाब से उन्हें सुधरने का मौका मिला और उन्हें कम सजा मिली थी।