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Gorakhpur News: एम्स में खेल....फ्रंटफुट पर आए ईडी ने अब भ्रष्टाचार पर घेरा

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गोरखपुर। एम्स गोरखपुर में कार्यकारी निदेशक (ईडी) और जनरल सर्जरी विभाग के एचओडी के बीच चल रही जंग अब और तेज हो गई है। रविवार को कार्यकारी निदेशक ने 10 पेज का सार्वजनिक पत्र लिखकर अपने पर लगे आरोपों का बिंदुवार जवाब दिया। उनका कहना है-यहां गद्दा-तकिया की खरीद में भी धांधली थी। जब हमने उस पर रोक लगाई तो बदनाम करने की साजिश रची गई। वहीं कार्यकारी निदेशक पर आरोप लगाने वाले डॉ. गौरव गुप्ता का कहना है कि जांच में सब कुछ सामने आ जाएगा।
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बीते पांच सितंबर को एम्स के जनरल सर्जरी विभाग के एचओडी व एडिशनल प्रो. डॉ. गौरव गुप्ता ने स्वास्थ्य मंत्रालय, सीएम पोर्टल, एसएसपी, एम्स थाना को ई-मेल भेजकर आरोप लगाया था कि कार्यकारी निदेशक डॉ. जीके पॉल के पुत्र औरव पॉल ने ओबीसी के गलत सर्टिफिकेट के आधार पर एम्स की पीजी में नामांकन लिया और मामला खुलने पर नामांकन वापस ले लिया। प्रकरण चर्चा में आने के बाद कार्यकारी निदेशक एम्स पटना और उसके बाद दिल्ली चले गए थे।



रविवार को अपना पक्ष रखते हुए कार्यकारी निदेशक ने कहा कि उनके कार्यकारी निदेशक के रूप में गोरखपुर आने के बाद से कुछ लोग बेचैन हो गए हैं। यहां कार्यकारी निदेशक के बंगले के लिए पर्दे, बिस्तर के कवर, गद्दे आदि जैसे कुछ सामान की खरीद के बिल भी बढ़ाकर प्रस्तुत किए गए। छात्रावास मेस में खाद्य सामग्री के बढ़े हुए बिल दिखाए गए। बिल में भोजन करने वालों की वास्तविक संख्या से अधिक दर्शाया जा रहा था। छात्र मेस में खराब गुणवत्ता के भोजन की शिकायत थी। यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जब छोटी-छोटी खरीद में इतना भ्रष्टाचार है तो बड़ी खरीदारी में क्या होता होगा। इसके बाद खरीदारी पर निगरानी के लिए अतिरिक्त उपाय किए। इसके बाद से ही उनके खिलाफ साजिश शुरू हो गई।
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दो साल में एक भी दिन नहीं ली छुट्टी



कार्यकारी निदेशक का कहना है कि उन्होंने पिछले दो वर्षों में लगातार काम किया है। एक भी दिन की व्यक्तिगत छुट्टी नहीं ली है। एम्स पटना के अलावा एम्स गोरखपुर में भी उनका कार्यालय रविवार और छुट्टियों सहित सभी दिनों में काम करता है। कर्मचारियों ने उनके खिलाफ उच्च अधिकारियों से आठ घंटे के कार्य शेड्यूल के श्रम कानूनों की अवहेलना की शिकायत की है। इसलिए, उनके पास कर्मचारियों के दो सेट हैं, एक समूह सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक काम करता है और दूसरा दोपहर एक बजे से जब तक वह कार्यालय में हैं, तब तक रहते हैं। अपनी मेहनत से एम्स पटना का राष्ट्रीय स्तर पर उच्च रैंकिंग दिलाने के साथ ही गोरखपुर में भी वैसा काम किया। 21 अगस्त को संस्थान निकाय बैठक के रिकाॅर्ड में भी इसे दर्ज किया गया है।





एडीएम ने जारी किया है प्रमाण पत्र



बेटे और बेटी के जाति प्रमाण पत्र पर जवाब देते हुए कार्यकारी निदेशक ने कहा कि ओबीसी एनसीएल प्रमाण पत्र पटना के अपर जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) की ओर से जारी किया गया था। इसके लिए आवेदन पत्र में मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, निवास प्रमाण पत्र, माता-पिता की आय (फॉर्म-16) आदि जमा किए गए थे। आवेदन 26 दिसंबर 2023 को जमा किया गया और प्रमाण पत्र 13 जनवरी, 2024 को जारी किया गया। हालांकि, प्रमाण पत्र में आवासीय पते (निदेशक के बंगले) के अधिकार क्षेत्र में त्रुटि थी और आय प्रमाण पत्र में केवल उनकी आय 43 लाख 17 सौ रुपये बताई गई थी। अप्रैल, 2024 में पते में सुधार करने और माता-पिता दोनों की आय को शामिल करने का अनुरोध किया गया और संशोधित प्रमाण पत्र जारी किया गया। ओबीसी एनसीएल प्रमाण पत्र के साथ माता-पिता की आय आठ लाख से कम होने का दावा निराधार और दुर्भावनापूर्ण है। बेटी का चयन जनवरी, 2024 में एफएमटी में अनारक्षित (यूआर) श्रेणी में एसआर के रूप में हुआ था। दिसंबर 2023 में पति के पते कटकेनवा, मोतिहारी, बिहार से जारी हुआ है। अपने बेटे और बेटी के ओबीसी-एनसीएल प्रमाण पत्र के लिए, उन्होंने प्रमाण पत्र जारी करने वाले प्राधिकरण के समक्ष कोई तथ्य और दस्तावेज नहीं छिपाए हैं।





डॉ. गौरव और डॉ. संगीता पर हैं गंभीर आरोप



एडिशनल प्रोफेसर एवं सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. गौरव गुप्ता के आरोपों का जवाब देते हुए कार्यकारी निदेशक ने लिखा है कि यदि किसी छात्र के प्रमाण पत्र फर्जी होने का संदेह है तो इसकी जांच व कार्रवाई संस्थान का काम है, न की संकाय का। संस्थान के निदेशक के खिलाफ एफआईआर के लिए डॉ. गौरव ने सक्षम प्राधिकारी से अनुमति नहीं ली। डॉ. गौरव गुप्ता और उनकी पत्नी डॉ. संगीता गुप्ता का चयन प्रोफेसर पद के लिए नहीं हुआ। फीजियोलॉजी की अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. संगीता गुप्ता ने संस्थान के अध्यक्ष को उनके खिलाफ शिकायती पत्र भेजा था। इसके जवाब में उन्होंने बताया था कि विभाग में उनके खिलाफ गंभीर शिकायतें हैं और एक आंतरिक समिति ने अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की है। एम्स गोरखपुर में कार्यभार ग्रहण करने के दौरान उन्होंने यह नहीं बताया था कि उस समय पटना उच्च न्यायालय में उनके खिलाफ एम्स पटना में अनुसूचित जाति के फीजियोलॉजी के सहायक प्रोफेसर के खिलाफ अत्याचार से संबंधित एक आपराधिक मामला लंबित था। अगर उन्होंने यह बताया होता, तो उन्हें एम्स गोरखपुर में ज्वाइन करने की अनुमति नहीं दी जाती। इसलिए तथ्य को जानबूझकर छिपाना भी एक आपराधिक कृत्य है। डॉ. संगीता गुप्ता ने प्रोफेसर पद के लिए फैकल्टी चयन के खिलाफ कैट की माननीय इलाहाबाद बेंच में मामला दायर किया था, जिसे खारिज कर दिया गया और फिर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील की, उसे भी खारिज कर दिया गया।

वर्जन



एम्स में अधिकतर खरीदारी जेम पोर्टल के जरिए होती है। बहुत जरूरी होने पर ही लोकल परचेज किया जाता है। खरीद पर निगरानी के लिए पहले से ही लेखाधिकारी नियुक्त हैं। इसके बाद एक अतिरिक्त फैकेल्टी भी है। अगर कहीं भ्रष्टाचार की कोई शिकायत या आरोप है, तो उसकी जांच कराकर कार्रवाई की जानी चाहिए। आरोप-प्रत्यारोप से संस्थान की छवि खराब होगी।



-एके सिंह, उप निदेशक प्रशासन-एम्स



मैंने एम्स गोरखपुर में ज्वाइन करते वक्त एम्स पटना से संबंधित सभी तथ्य बताए थे। कोई तथ्य नहीं छिपाए। अब जब प्रकरण की जांच होने लगी है तो कार्यकारी निदेशक ने विषयों को बहकाने के लिए इधर-उधर के आरोप लगा रहे हैं। उन्हें जांच का सामना करना चाहिए। मैं अपना पक्ष जांच अधिकारी के सामने रखूंगा।
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-डॉ. गौरव गुप्ता, एचओडी जनरल सर्जरी विभाग एम्स
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