जीएसटी टीम का कोराबारी से सवाल था कि गोरखपुर की फर्म को जब पीछे की फर्म से इनवॉइस कटने की जानकारी थी और उन तक सामान नहीं आ रहा था तो इसकी सूचना विभाग को क्यों नहीं दी गई? ऐसे में कारोबारी शक के घेरे में आ गया, क्योंकि टीम को रिकॉर्ड देखकर लग गया कि बोगस फर्मों में व्यापारी की भी सांठगांठ रही होगी। तभी कारोबारी बोगस फर्मों के जरिए करोड़ों रुपये के माल को इनवॉइस पर्ची के रूप में आगे बढ़ाता गया और गोरखपुर की फर्म से उसे नेपाल भेज दिया गया।
जीएसटी के अफसरों ने बताया कि नेपाल भेजे जाने वाले सामान की स्वीकृति कस्टम विभाग से करानी होती है। ऐसे में फर्म को दो नियमों का पालन करना होता है। पहला यह कि सामान के कर का भुगतान फर्म को पहले ही कर देना होता है। जबकि, दूसरा नियम यह है कि सामान की डिलिविरी के बाद कर का भुगतान करना होता है। इन नियमों का पालन करने वाली फर्म को ही जीएसटी के नियमानुसार राजस्व का लाभ मिलता है।
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दरअसल कस्टम में बुकिंग के बाद नेपाल भेजने पर टैक्स शून्य हो जाता है। इसी तरह तस्कर बोगस फर्मों के सहारे सरकार को भारी मात्रा में राजस्व की क्षति पहुंचा रहे हैं। केंद्रीय टीम ऐसे रैकेट को घेरे में ले चुकी है। उनके रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं। प्रमाण जुटाकर कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में कुछ ऐसी फर्मों पर जीएसटी टीम बड़ी कार्रवाई कर सकती है।
जीएसटी टीम को छानबीन में पता है कि 18 प्रतिशत से 28 प्रतिशत तक के कर वाले मर्चेंट एक्सपोर्टर इस खेल में खूब बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। इनकी फर्मों की जांच कराई जा रही है, ताकि राजस्व के चपत की कहानी और स्पष्ट हो जाए। मर्चेंट एक्सपोर्टर 18 प्रतिशत से लेकर 28 प्रतिशत वाले कर के सामानों को नेपाल भेजते हैं। इन्हें वो पीछे की फर्मों से खरीदकर मंगवाते हैं।
सूत्र बताते हैं कि अक्सर बोगस फर्मों की इनवॉइस तो मिल जाती है, लेकिन फर्म अंतिम जीएसटी पंजीयन से ही सामान खरीदकर पीछे से आया माल दिखा देती हैं। इससे जीएसटी के नियमों का फायदा मिलने के साथ टैक्स, टोल, ट्रांसपोर्टेशन और अन्य खर्चे भी बच जाते हैं।