गाेरखपुर। गोरखपुर विश्वविद्यालय के रानी लक्ष्मीबाई छात्रावास में रहने वाली मुस्लिम छात्राएं पढ़ाई के साथ-साथ रोजा रख कर अल्लाह की इबादत भी कर रही हैं। छात्राओं के रोजे की शुरुआत सुबह अलार्म बजने से होती है और शाम को फोन से अजान सुनकर रोजा पूरा होता है। इसके बाद सब एक साथ बैठकर इफ्तारी करती हैं और फिर इबादत में लग जाती हैं।
घर में रोजा रखने पर परिवार साथ होता है। सुबह उठाने से लेकर शाम के इफ्तारी की व्यवस्था परिवार के सदस्य मिलकर कर लेते हैं। इस कारण रोजा रखने में बच्चों को सहायता मिलती है। पर, घर से दूर जाकर बाहर पढ़ाई करने के दौरान ये सब नहीं मिल पाता। इसी बीच गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्रावास की छात्राएं परिवार की तरह एक-दूसरे को सपोर्ट करती हैं। छात्राएं रात में अलार्म लगाकर सोती है, ताकि सुबह सहरी के समय पर उठ जाएं। इसके बाद एक-दूसरे का दरवाजा खटखटा कर उन्हें भी उठाती हैं। सहरी के लिए हाॅस्टल में मिलने वाले दूध, केले के साथ ब्रेड खाकर रोजे की शुरुआत करती हैं। विश्वविद्यालय, कोचिंग की भागदौड़ में दिन बीत जाता है। नमाज पढ़ने के लिए सुबह, शाम और कक्षाओं से आने के बाद अल्लाह की इबादत करने का समय निकाल लेती हैं। शाम काे सब एक साथ इफ्तारी करती हैं। छात्रावास में मेस रात में खुलता है। इस कारण वे शाम के नाश्ते और बाजार से लाए सेब, केला, पकौड़ी आदि सामानों के साथ इफ्तारी करती हैं।
मिलता है दूध-केला
छात्रावास में रहने वाली छात्राओं को रोजे के दौरान दूध और केले के अलावा कुछ खास नहीं मिलता है। सहरी में वह दूध के साथ ब्रेड खा लेती हैं। छात्रावास का मेस रात में खुलता है तो बाहर से अपने पसंद की चीजें लाकर शाम की इफ्तारी करनी पड़ती है। छात्राओं ने कभी मेस में खाने की मांग नहीं की।
छात्राओं ने कभी रोजा में इफ्तारी में आने वाली दिक्कतों के बारे में नहीं बताया। अगर पहले पता होता तो हम उनके लिए व्यवस्था कर देते। उनके लिए खाने की व्यवस्था के साथ रोजा में जो भी सहयोग हो सकेगा, हम सब कुछ करेंगे।
- प्रो. उषा सिंह, लक्ष्मीबाई छात्रावास वार्डन
हाॅस्टल में रात में दूध-केला मिलता है, जिसे सहरी के रूप में खाते है। दिन भर विश्वविद्यालय जाने-आने से थक जाते पर अल्लाह की इबादत भी जरूरी है। रोजा रहने से नई ऊर्जा का मिलती है।
- रूबीना खातून
दोस्तों का साथ मिलने से परिवार की कमी कम खलती है। मां के बनाए व्यंजनों की याद आती है। सहयोग से हम इफ्तारी की व्यवस्था करते है। घर से मां फोन कर अजान सुनाती है। इसके बाद हम रोजा खोलते हैं।
- शाहिदा बानो
रात में मेंस देर से खुलता है तो शाम के नाश्ते से काम चलाना पड़ता है। नाश्ते के साथ बाजार से खाने का सामान लाते है, फिर सभी एकसाथ बैठ कर नमाज अदा कर अल्लाह को शुक्रिया कर इफ्तारी करते हैं।
- शाहीन अंजुम
रोजा रहने में दिक्कत बहुत होती है। दिन भर भाग-दौड़ के बाद शाम को इफ्तारी की व्यवस्था भी खुद करनी पड़ती। पर, दोस्तों के साथ रोेजा रखने से उत्साह बढ़ता है। अन्य धर्म की दोस्त रोजा में हमें भरपूर सहयोग रखती है।
- नाजिया परवेज