गोरखपुर। तारामंडल स्थित निजी रिजॉर्ट में चल रही रामकथा के आठवें दिन रविवार को कथा व्यास आचार्य धीरज कृष्ण ने राम के वनवास, भरत मिलाप और रावण वध का प्रसंग सुनाया। कहा कि वचन की मर्यादा के लिए राम ने वनवास को सहर्ष स्वीकार किया। कथा सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
कथा व्यास ने कहा कि भगवान राम का वनवास रामायण का सबसे भावुक और महत्वपूर्ण प्रसंग है। राजा दशरथ ने राम के राज्याभिषेक का निर्णय लिया था। इससे पूरी अयोध्या में उत्सव का माहौल था। इसी बीच दासी मंथरा के बहकाने पर रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने दो वरदान मांग लिए। इनमें भरत को अयोध्या का राजा बनाने और राम को 14 वर्ष का वनवास देने की मांग शामिल थी।
राजा दशरथ अपने वचन से बंधे थे और इस निर्णय से गहरे दुख में डूब गए। जब राम को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने बिना किसी विरोध के पिता के वचन की रक्षा के लिए वनवास स्वीकार कर लिया। माता सीता और भाई लक्ष्मण ने भी राम के साथ वन जाने का निर्णय लिया। तीनों ने राजसी वस्त्रों का त्याग कर मुनि वेश धारण किया और वन की ओर प्रस्थान किया।
राम के वियोग में राजा दशरथ ने प्राण त्याग दिए। भरत जब अयोध्या लौटे और उन्हें पूरे घटनाक्रम की जानकारी हुई तो उन्होंने राजपाट स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। कथा व्यास ने वनवास के दौरान राम के ऋषि-मुनियों के आश्रमों में जाने, राक्षसों के संहार, पंचवटी में सीता हरण और इसके बाद सुग्रीव व हनुमान की सहायता से लंका पर विजय का प्रसंग भी सुनाया। कथा के मुख्य यजमान सहजनवां विधायक प्रदीप शुक्ला, शरत चंद्र त्रिपाठी, किरण त्रिपाठी, इंदिरा शुक्ला, मीनू पांडे, संजय श्रीवास्तव, प्रशांत श्रीवास्तव, राजेश श्रीवास्तव, ज्योति श्रीवास्तव, चिकित्सक डॉ. केशव लाल श्रीवास्तव, ज्योतिषाचार्य पवन पांडेय और विश्व हिंदू परिषद के जिला मंत्री इ. संजीत श्रीवास्तव रहे।
इस दौरान आचार्य शिवम शास्त्री, आचार्य अभिषेक मिश्रा, मंजीत श्रीवास्तव, अविनाश श्रीवास्तव, शिवम मिश्रा, हिमांशु मिश्रा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी रही।