पंडित डॉ. जोखन पांडेय ने बताया कि इस व्रत की कथा का उल्लेख ब्रह्म पुराण में मिलता है। प्राचीन काल में महीध्वज नाम का एक राजा था। उसका व्रतध्वज नामक छोटा भाई बड़ा ही अधर्मी, अन्यायी और क्रूर था। व्रत अपने बड़े भाई से ईष्या-द्वेष रखकर हानि पहुंचाने का अवसर ढूंढता रहता था।
एक दिन बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर पीपल के वृक्ष के नीचे गाड़ दिया। वह राजा उस वृक्ष पर प्रेत योनि में रहकर अनेक प्रकार के उत्पात मचाने लगा। एक दिन उस वृक्ष के नीचे से धौम्य ऋषि गुजरे तो अपने तपोबल से प्रेत के कारनामे और उसकी कथा जानी।
धौम्य ने राजा महीध्वज (प्रेत) को नीचे बुलाकर कहा कि तुम्हारे पूर्व जन्म के पाप कर्मों के कारण तुम्हारी हत्या हुई और प्रेत योनि मिली है। यदि तुम इससे मुक्ति चाहते हो तो ज्येष्ठ मास की अपरा एकादशी का व्रत करो। महीध्वज ने वैसा ही व्रत किया। व्रत और उपवास के प्रभाव से उसे प्रेत योनि से छुटकारा मिला और पुन: दिव्य शरीर धारण कर अन्त में मोक्ष को प्राप्त हुआ।