- अंग्रेजों ने देशभर में समय की समरूपता के लिए बनाई थी व्यवस्था
- डिजिटल क्लॉक आने के बावजूद एनईआर में आज भी जारी है व्यवस्था
राजन राय
गोरखपुर। पूर्वोत्तर रेलवे के रेलवे स्टेशनों पर आज भी शाम के ठीक चार बजे स्टेशन मास्टर के कमरे में एक घंटी बजती है। करीब 30 सेकेंड तक बजने वाली इस घंटी का संदेश यह होता है कि शाम के चार बज गए हैं, अपनी घड़ी मिला लें। घड़ी अगर स्लो है तो उसे ठीक किया जाता है। यह व्यवस्था अंग्रेजों ने शुरू की थी ताकि ट्रेनों के संचालन में दिक्कत न आए। हालांकि, जीपीएस आधारित घड़ी आ जाने के बावजूद एनईआर में आज भी यह व्यवस्था कायम है।
दरअसल, आजादी से पहले तिरहुत रेलवे, असम रेलवे, बांबे-वड़ोदरा, सेंट्रल इंडिया रेलवे सहित 42 रेलवे कंपनियां अलग-अलग क्षेत्रों में ट्रेनों का संचालन करातीं थीं। हर रेलवे कंपनी का अलग टाइम टेबल था लेकिन जब पूरे देश का रेल नेटवर्क जोड़ा गया तो समय की एकरूपता एक बड़ी चुनौती बनी। इस बात का जिक्र पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी पंकज कुमार की सिंह की पुस्तक ''''''''''''''''छोटी लाइन : जर्नी ऑफ ए ट्रांसफार्मेशन'''''''''''''''' में किया गया है। इसके मुताबिक, अंग्रेजों ने पूरे देश में रेलवे के समय को चेक करने के लिए शाम चार बजे का समय रखा। मकसद यह था कि देशभर में रेलवे के लिए एक यूनिफार्म टाइम सुनिश्चित किया जाए।
शनिवार को कैंट रेलवे स्टेशन पर शाम चार बजे घंटी बजते ही स्टेशन मास्टर आरके सिंह ने फोन रिसीव किया और संदेश प्राप्त होते ही घड़ी चेक की। हालांकि, यह व्यवस्था कब शुरू हुई इसका सटीक विवरण उपलब्ध नहीं है पर जानकारों के मुताबिक, वर्ष 1880 से 85 के बीच इसे लागू किया गया। इसे लेकर बाकायदा स्टेशन मास्टर को ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें पता होता है कि शाम के चार बजे घंटी बजेगी और उस समय घड़ी को चेक करना है। पहले टेलीग्राम के माध्यम से यह संदेश आता था लेकिन बाद में टेलीफोन से सूचना दी जाने लगी। पूर्वोत्तर रेलवे में लालकुआ, मैलानी, नरकटियागंज रूट पर कई स्टेशन ऐसे थे जहां ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) आधारित घड़ी नहीं थी क्योंकि वहां सिग्नल का नेटवर्क नहीं था। अब रेलवे ने वहां भी जीपीएस क्लॉक लगा दी है। जीपीएस क्लॉक भी बैटरी से चलती है इसलिए उसे भी चेक करना है कि घड़ी स्लो तो नहीं है क्योंकि उसी के आधार पर ट्रेनों का सिग्नल तय होता है।
1930 में प्रकाशित हुआ हिंदी टाइमटेबल
वर्ष 2002 में रेलवे के इतिहास पर आधारित प्रकाशित पुस्तक ''''''''''''''''छोटी लाइन : जर्नी ऑफ ए ट्रांसफार्मेशन'''''''''''''''' में इस बात का भी उल्लेख है कि पहला ऑल इंडिया हिंदी टाइमटेबल मई 1930 में वाराणसी से प्रकाशित हुआ था। एक से ज्यादा रेलवे लाइन पर चलने वाली थ्रू ट्रेनों का टाइमटेबल बनाना एक मुश्किल काम था, जिसके लिए पहले आसपास की लाइनों के बीच समन्वय की जरूरत थी। 1906 तक कोई आम सहमति नहीं बन पाई थी जब इलाहाबाद (प्रयागराज) पर आधारित एक सिंगल टाइम जोन बनाया गया और एक स्टैंडर्ड टाइम जोन शुरू किया गया जिसे रेलवे ने अपना लिया।
वर्तमान में सभी स्टेशनों पर डिजिटल जीपीएस क्लॉक लग गए हैं पर एक समय ऐसा था, जब देश में एक यूनिफॉर्म टाइम डिफाइन करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। पूर्वोत्तर रेलवे की ऐतिहासिक यात्रा पर आधारित बुक छोटी लाइन में इसका जिक्र है कि किस प्रकार रेलवे द्वारा पूरे देश में यूनिफॉर्म टाइम तय किया गया।
- पंकज कुमार सिंह, सीपीआरओ, एनईआर