कप्तानगंज के ओझागंज कस्बे के हरिश्चंद्र अपनी एकमात्र बची चौथी बेटी का इलाज नहीं करा पा रहे हैं। धन के अभाव में लखनऊ ले जाकर इलाज कराने में असमर्थता व्यक्त की तो स्वास्थ्य विभाग ने कोई व्यवस्था करने के बजाय बीमार बेटी को घर भिजवा दिया। सीएमओ कहते हैं कि उसके परिवार में कुपोषण से नहीं, बल्कि बीमारी से बच्चों एवं पत्नी की मौत हुई है। अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकार को आयोग ने नोटिस दिया तो स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है।
पीड़ित हरिश्चंद्र का कहना है कि पांच माह की शशि, दो माह की लक्ष्मी एवं एक माह की बच्ची की मौत हो चुकी है। पहले बच्चे की मौत करीब 14 साल पहले हुई थी। इसके बाद पांच साल तक कोई औलाद नहीं हुई। पांच साल बाद उसे फिर एक बच्ची हुई, लेकिन दो माह बाद उसकी भी मौत हो गई। इसके बाद एक और बच्ची ने जन्म लिया, मगर वह भी माहभर में दुनिया छोड़ गई।
कुछ दिनों बाद एक और बच्ची ने जन्म लिया। वह दिमागी रूप से कमजोर थी। इसके बाद अचानक पत्नी गीता बीमार हो गई। इलाज दिल्ली तक कराया गया, मगर आठ माह पहले उसकी भी मौत हो गई। अब हरिश्चंद्र के पास उसकी चार साल की बेटी है, जो बीमार है। बेटी की जिंदगी बचाने के लिए हरिश्चंद्र घर से बाहर नहीं जा पाते। ऐसे में वे दानेे-दाने को मोहताज हैं। कोटा दुकानदार उन्हें दस किलो अनाज देेते हैं।
मीडिया में खबर आने के बाद स्वास्थ्य विभाग जागा तो बेटी के इलाज के लिए उसे सीएचसी कप्तानगंज में भर्ती करा दिया, मगर दो दिन बाद उसे भी जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद लखनऊ रेफर किया गया। धन के अभाव के कारण हरिश्चंद्र ने लखनऊ जाने से मना कर दिया, जिस पर उसे घर भेज दिया गया।
उधर सीएमओ डॉ. जेपी त्रिपाठी ने कहा कि हरिश्चंद्र के परिवार में कुपोषण से किसी की मौत नहीं हुई, बल्कि पहले बच्चे की मौत 14 साल पहले, दूसरे की छह-सात साल पहले, जबकि तीसरे बच्ची की मौत भी चार साल पहले हुई है। हरिश्चंद्र की पत्नी गीता की कुपोषण नहीं, बल्कि बीमारी की वजह से मौत हुई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की नोटिस से पहले ही स्वास्थ्य विभाग की टीम वहां गई थी। यह जरूर है कि परिवार गरीब है। उसे अंत्योदय का कार्ड तो नहीं मिला है, मगर पात्र गृहस्थी का कार्ड जारी हुआ है।