कार्यक्रम के दौरान पद्मश्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, प्रो. राकेश सिन्हा, प्रो. पूनम टंडन व अन्य।
गोरखपुर। पद्मश्री प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि जिसने भी जीवन में बड़ा कार्य किया है, उसने तप के बल पर ही सफलता प्राप्त की है। साहित्य का तप अलग होता है, क्योंकि साहित्य समाज से कभी अलग नहीं हो सकता। साहित्य में पूरी सृष्टि समाहित होती है। साहित्य का आधार तप और समाज से जुड़ाव है।
वह रविवार को नांगलिया शिक्षा एवं स्वास्थ्य संस्थान (नेहा) की ओर से आयोजित साहित्य विमर्श में साहित्य, समाज और डिजिटल युग विषय पर बतौर कार्यक्रम अध्यक्ष बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान में लिखा गया साहित्य भविष्य का भी मार्गदर्शन करता है।
मुख्य वक्ता प्रो. राकेश सिन्हा ने कहा कि साहित्य और समाजशास्त्र को आलोचनात्मक चिंतन के आधार पर समाज का मार्गदर्शन करना चाहिए। डिजिटल युग पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि तकनीक केवल एक माध्यम है, मस्तिष्क और विचार ही सबसे महत्वपूर्ण हैं। डिजिटल माध्यम ने ज्ञान और अभिव्यक्ति को अधिक लोगों तक पहुंचाया है। इसलिए इसे चुनौती नहीं बल्कि अवसर के रूप में स्वीकार करना चाहिए।
विशिष्ट अतिथि दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व और सोच का निर्माण करता है। चिकित्सकों का साहित्य, रंगमंच और कला से जुड़ना समाज के स्वस्थ विकास का संकेत है। गोरखपुर विश्वविद्यालय के रक्षा अध्ययन विभाग के प्रो. हर्ष सिन्हा ने कहा कि डिजिटल तकनीक समाज और जीवनशैली दोनों को बदल रही है। सूचना की अधिकता के दौर में लोग गहराई से अध्ययन कम कर रहे हैं, जो चिंता का विषय है।
कार्यक्रम में प्रस्तोता डॉ. आमोद राय रहे। दूसरे सत्र की अध्यक्षता डॉ. महेंद्र अग्रवाल ने व आभार ज्ञापन डॉ. रुचिका अग्रवाल ने किया। प्रथम सत्र का संचालन चारुशिला सिंह एवं आभार राधेश्याम अग्रवाल ने किया। तृतीय सत्र में कवि सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, डॉ. वेद प्रकाश पांडेय, प्रो. अनंत मिश्र, वीआर विप्लवी, महेश अश्क, देवेंद्र आर्य और ओम प्रकाश नदीम ने काव्य पाठ किया।