‘मां! हो सकता है मेरा जन्म कुछ ऐसी परिस्थितियों में हुआ हो, जिनमें मुझे साथ न रख पाना तुम्हारी मजबूरी हो। संभव है, मैं उस प्रेम का नतीजा हूं जिसे समाज मान्यता न दे रहा हो। हो सकता है मैं एक बेटी हूं, जिसे मेरे ही परिवार के लोग स्वीकार न कर रहे हों। लेकिन, जीने का हक तो मुझे भी है। तुमने मुझे नौ माह तक अपने गर्भ में पाला। मुझे जीवन देने के लिए कई संघर्ष किए, ये मुझे पता है। एक आखिरी बार और हिम्मत करना, मुझे नेकी के पालने तक पहुंचा देना।’
कुछ ऐसा ही सोचता होगा वह नवजात जिसे जन्म के बाद ही कहीं छोड़ आने की बात की जाती होगी। कहा जाता होगा- ले जाओ, कहीं झाड़ियों में फेंक आओ इसे। झाड़ियां, जहां वह दुधमुंहा भूख-प्यास से तड़पेगा। जहां उसे कुत्ते, सांप और न जाने कौन-कौन से जानवर अपना आहार बनाने के लिए इंतजार कर रहे होंगे।
ऐसे नवजातों को जीवन मिल सके। इसके लिए महिला जिला अस्पताल के गेट पर पालना लगाया गया है। हमने इसे नेकी का पालना नाम दिया है। क्योंकि इसके पीछे की नीयत नेक है। इस पालने में कोई भी लावारिस नवजात को रख सकेगा। रखने वाले का नाम-पहचान सब कुछ गोपनीय रहेगी।