मौके पर मौजूद एक अभियंता ने बताया कि करीब 6,000 रुपये प्रति लीटर कीमत वाले विशेष केमिकल का उपयोग किया जा रहा है, जो दरारों को ठोस भराई प्रदान करता है। इससे हवा और पानी के प्रवेश की संभावना नहीं रहती और भविष्य में समस्या उत्पन्न होने की आशंका कम हो जाती है।
जंगल कौड़िया में निर्मित सिक्सलेन फ्लाईओवर की छत में पिछले चार दिनों से दरारें दिखाई देने से इलाके में दहशत है। शुक्रवार तक छत में 17 दरारें नजर आई थीं, जो शनिवार को बढ़कर 26 हो गईं। दरारें अब फ्लाईओवर के मध्य भाग से एक छोर तक फैल चुकी हैं।
विज्ञापन
स्थानीय लोग फ्लाईओवर के नीचे से होकर गुजरने से कतरा रहे हैं और निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठा रहे हैं। उधर, एनएचएआई का कहना है कि यहां आवागमन पूरी तरह सुरक्षित है।
गोरखपुर-सोनौली फोरलेन के चौड़ीकरण के दौरान जंगल कौड़िया में सिक्सलेन फ्लाईओवर बनाया गया है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि निर्माण में गुणवत्ता की अनदेखी हुई है। इतनी जल्दी दरारें पड़ना चिंताजनक है। हालांकि, एनएचएआई और ठेकेदार कंपनी पीएनसी इंफ्राटेक के अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर परीक्षण के बाद आवागमन को पूरी तरह सुरक्षित बताया।
फ्लाईओवर का निर्माण भविष्य में सड़क को सिक्सलेन बनाने की दृष्टिकोण से किया गया है, ताकि दोबारा इसके निर्माण की आवश्यकता न पड़े लेकिन अब करीब दो फीट मोटी छत में दरारें दिखने से हड़कंप मच गया है। शनिवार को कटर मशीन से घिसाई के दौरान नौ नई दरारें सामने आईं। शुक्रवार को मौजूद 17 दरारों को विशेष केमिकल से भरा गया था।
मौके पर मौजूद एक अभियंता ने बताया कि करीब 6,000 रुपये प्रति लीटर कीमत वाले विशेष केमिकल का उपयोग किया जा रहा है, जो दरारों को ठोस भराई प्रदान करता है। इससे हवा और पानी के प्रवेश की संभावना नहीं रहती और भविष्य में समस्या उत्पन्न होने की आशंका कम हो जाती है।
पीएनसी इंफ्राटेक और एनएचएआई के अधिकारियों का कहना है कि कुछ परिस्थितियों में इस प्रकार की दरारें सामान्य होती हैं और आगे नहीं बढ़तीं। फ्लाईओवर के नीचे से गुजरना या ऊपर से वाहनों का आवागमन पूरी तरह सुरक्षित है।
शनिवार को मौके का निरीक्षण किया गया। आवागमन में किसी प्रकार की समस्या नहीं है। कुछ भौतिक कारणों से दरारें बनी हैं। दरारों की भराई विशेष केमिकल से की जा रही है। ये बहुत पतली दरारें थीं। दरारें क्यों बनीं, इसकी जांच विशेषज्ञों द्वारा कराई जा रही है। इसके बाद फ्लाईओवर की भार वहन क्षमता का परीक्षण भी किया जाएगा: ललित प्रताप पाल, परियोजना निदेशक, एनएचएआई