इसी तरह से बालूघट्टा के जसई 20 साल से अधिक समय से चकबंदी की पीड़ा से जूझ रहे हैं। वह कचहरी में अपने वाद की पैरवी करने आए थे। उनका एक बीघा का चक गलत कट गया था। उन्होंने इसका वाद दाखिल किया तो मामला उप संचालक चकबंदी के वहां निगरानी में लग गया। 15 से एक माह में उनके मुकदमे की तारीख लगती है। वह जब कचहरी आते हैं तो मालूम होता है कि अगली तारीख लग गई है। उनको दिनभर का नुकसान से ज्यादा किराया और वकील की फीस खलती है।
16 साल से लगा रहे चक्कर
खोराबार नदुआ निवासी कैलाश ने कहा कि 16 साल से मेरा मामला लंबित है। चकबंदी के दौरान कर्मचारियों ने गड़बड़ी कर दी। उसका खामियाजा मैं भुगत रहा हूं। पत्थर नसब कराने के लिए मैंने अपील की है। हर माह तारीख मिलती है। चक्कर लगाकर परेशान हूं। ना जाने कितने वर्षों तक मामला चलेगा।
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बेटों का पैसा तारीख पर उड़ रहा
बालूघट्टा निवासी जसई ने कहा कि चकबंदी कैसे होती है, इसकी जानकारी नहीं थी। बाद में पता लगा कि गलत चक कट गया है। तभी से इस चक्कर में परेशान हैं। बाहर रहकर कमाने वाले बेटे पैसे भेजते हैं, तब यहां तारीख देखने आते हैं। सब इसी में उड़ जाते हैं।
चकबंदी उप संचालक राजनारायण तिवारी ने कहा कि वाद की प्रक्रिया लंबी होती है। इसमें तीन स्तर पर आपत्ति, अपील और निगरानी की व्यवस्था है। कोई मामला सामने आने पर नोटिस जारी होता है। इसके बाद संबंधित पक्षों का तलब किया जाता है। कभी एक पक्ष आता है तो दूसरा नहीं आता है। इस वजह से विलंब होता है। कई बार पैरवीकार भी सक्रिय भूमिका नहीं निभाते हैं।