दिमागी बुखार से पीड़ित बच्चों की अब पांच की जगह छह तरह की जांचें होंगी। जांच में लैप्टोस्पायरोसिस को भी शामिल किया गया है। शासन ने जिले में लैप्टास्पायरोसिस के मरीज मिलने के बाद यह फैसला लिया है।
पूर्वांचल में जापानी इंसेफेलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (जेई/एईएस) के मरीज हर साल मिलते हैं। पिछले कुछ सालों में इनकी संख्या कम हुई है। लेकिन, इसी बीमारी के अंतर्गत पहली बार जिले में लैप्टोस्पायरोसिस के मरीज मिले हैं।
पूरे वर्ष में करीब 96 मरीज जेई/एईएस के मिले हैं। इनमें जेई के तीन लैप्टोस्पायरोसिस के 10 और अन्य मरीज एईएस के थे। लैप्टोस्पायरोसिस मरीजों के मिलने बाद शासन ने फैसला लिया है कि दिमागी और हाई ग्रेड बुखार से पीड़ित सभी बच्चों की जेई, मलेरिया, स्क्रब टायफस, डेंगू, चिकनगुनिया के अलावा लैप्टोस्पायरोसिस की भी जांच की जाएगी।
सीएमओ डॉ. आशुतोष कुमार दूबे ने बताया कि जेई और लैप्टोस्पायरोसिस जांच की सुविधा जिला अस्पताल में शुरू कर दी गई है। इसके अलावा चार तरह की जांच की सुविधा ब्लॉक स्तरीय अस्पतालों पर भी है। बताया कि लैप्टोस्पायरोसिस जेई/एईएस समूह का एक वायरस है। इसमें भी मरीजों को झटका, तेज बुखार के साथ असहनीय पीड़ा होती है। यह चूहा और छूछंदर के पेशाब और उनके मल से होता है।
आरएमआरसी की जांच में मिले थे 50 फीसदी मरीज
बीआरडी और जिला अस्पताल में भर्ती पांच तरह की बीमारियों, स्क्रब टायफस, लैप्टोस्पायरोसिस, डेंगू, चिकनगुनिया व एंटरोवायरस से पीड़ित बच्चों की आरमएआरसी ने जांच की थी। इसके लिए 88 मरीजों के नमूने लिए गए। इनमें 50 फीसदी मामलों में लैप्टोस्पायरोसिस के मरीज मिले। जबकि, एक में स्क्रब टायफस, नौ में डेंगू, तीन में चिकनगुनिया ओर तीन में एंटरोवायरस मिला। यह सभी नमूने पूर्वांचल के अलग-अलग जिलों के भर्ती कराए गए मरीजों के थे।