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Gorakhpur News: युवाओं को खूब भा रहीं जिंदगी से जुड़ीं किताबें

Tue, 08 Oct 2024 03:00 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
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संवाद न्यूज एजेंसी
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गोरखपुर। किताबें सिर्फ ज्ञान ही नहीं देती ये जिंदगी के अनुभवों को भी साझा करतीं हैं। किताबों को लेखकों ने भी इंसान का सच्चा दोस्त माना है। डिजिटल युग के आने के बाद किताबों को भौतिक रूप से पढ़ने वालों की संख्या बेशक कम हुई है, लेकिन आज भी बड़ा तबका किताबों में रुचि ले रहा है। कहानियों और साहित्य में रुचि लेने वाले किताबों को खोजते रहते हैं।
हाल में आई कलेक्टर साहिबा, प्रोफेसर की डायरी, टवेल्थ फेल, मेरी चीज किसने हटायी आदि युवाओं के बीच काफी चर्चित रहीं। आज भी अब्दुल कलाम, प्रेमचंद, रबीन्द्रनाथ टैगोर, सलमान रूश्दी, अरुंधति रॉय, आर के नारायण, झूम्पा लहरी, चेतन भगत आदि लेखकों की पुस्तकों को लोग दिलचस्पी के साथ पढ़ते हैं।
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बक्शीपुर के पुस्तक विक्रेता उत्तम अग्रवाल कहते हैं कि डिजिटल समय ने किताबों को प्रभावित किया है, पर आज भी किताबों को गहराई से पढ़ने वालों की कमी नहीं है। लोग नई किताबों को पूछते हुए आते हैं, जो उपलब्ध होती वह लेकर जाते हैं। कुछ किताबों को ऑर्डर देकर मंगाने के लिए भी कहते हैं। पुस्तक विक्रेता रजनीश द्विवेदी बताते है किताबों में रुचि रखने वाले लोगों की कमी नहीं हुई है। गंभीर और चिंतन करने वाले लोग आज भी किताबों को खरीदने आते हैं। प्रेमचंद की कहानियां, अग्नि की उड़ान, गुनाहों का देवता पुरानी किताबों की आज भी मांग है। हजार की संख्या से अधिक किताबें उपलब्ध है, जिसकी लोगों में मांग रहती ही है।


- कब हुई शुरुआत
राष्ट्रीय पुस्तक प्रेमी दिवस की शुरुआत अमेरिका में 1980 के दशक के मध्य हुई थी, जब लोगों ने महसूस किया कि पुस्तकें ज्ञान का स्रोत होने के साथ ही जीवन के मूल्यों को भी सिखाती है। पुस्तकें केवल पढ़ने के लिए नहीं होतीं, वे विचारों, संस्कृतियों, और ज्ञान का संचार भी करती हैं। एक अच्छी किताब एक व्यक्ति को न केवल नई जानकारी देती है बल्कि उनके सोचने के तरीके को भी बदल सकती है।

पुस्तकें केवल पढ़ने के लिए नहीं होतीं, वे विचारों, संस्कृतियों, और ज्ञान का संचार भी करती हैं। डिजिटल हो जाने से किताबों का समय घटा है। पर डिजिटल होने से नई किताबें आसानी से मिल भी जा रही हैं।
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आदित्य तिवारी
किताबे तर्क के माध्यम से जहां सत्य सिखाती है, वहीं इनकी कहानियां जिंदगी को जीना भी सिखाती है। किताबें पढ़ने से भाषा, शब्दकोश का ज्ञान बढ़ता है। इसलिए किताबें पढ़ती रहती हूं।
निधि मौर्य
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