‘केकरे नावें जमीन पटवारी-केकरे जांगर से माटी फुलाइलि, के खाये चाउर महीन, नालिस कहलीं दरोगावा आइल-बाबू के बंगला मुरगा कटाइल, मंडई फूंकि तमासा देखलें-चमकवले संगीन, केकरे नावे जमीन।’ देवरिया क कवि गोरख पांडेय के ई कविता जब बोलल गईल त महफिल में भोजपुरी क मिठास गूंजे लगल। मउका रहल भोजपुरी संगम क 119 वीं बइठकी क। मेडिकल कॉलेज रोड पर खरैया पोखरा के लगल भोजपुरी क सगरो प्रेमी जुटल रहलें।
बइठकी में डॉ आद्या प्रसाद द्विवेदी कहलें कि गरीब, किसान के जवन चित्र कलमकार गोरख पांडेय अपने कविता में परोसलें बांटें उ स्थिति आजो बरकरार बा। आजो दबका लो अपने धन आ बाहुबल के बूते गरीब-गुरबा क जमीन हड़प में लगल बाटें। गोरख बाबू के कविता में शासन व्यवस्था में जउन घटत रहल उही के उ गढ़त रहलें। कार्यक्रम में अध्यक्ष बनल रहलें सूर्यदेव पाठक पराग कहलें कि रचना क सार्थकता इहे होला कि उनके न रहले पर भी सगरो लोग उनके रचना से ही याद करत हवें।
उ बहुत बड़हन कवि रहलें। उनके कई भोजपुरी गीत के चौपालन में गावल जाला। कुशीनगर क परसहवां गावें के रहले वाले राम नरेश शर्मा आपन कविता ‘पराइल पिरीतिया कउ पांव मोरे गांव, जाके छुपल कवनो ठांव मोरे गांव’ सुनअलें त बइठकी में सगरो लोग ताली बजवे लगलें।
मधुसूदन पांडेय कहलें, ‘बाति-बाति में केहु से बिगार न करीं, अवहि बचल बा इज्जत खराब न करीं’ अउर डॉ फूलचंद प्रसाद गुप्त जब सुनउलें ‘साहब जब दफ्तर चलि जालें, फुरसत पा घर के कारे से, सगरी मेहरारू जुटि जाली, मन क गुबार निकारे के।’ त खूब ठहाका लगल। आयोजन में गजलकार सृजन गोरखपुरी, रवींद्र मोहन त्रिपाठी, बलराम राय, कुमार विनीत, अवधेश शर्मा, राजेश्वर सिंह क भी सहभागिता रहल।
बइठकी में आपन कवित सुनावे वालन में वीरेंद्र मिश्र दीपक, अवधेश शर्मा, कुमार अभिनीत, ओम प्रकाश पांडेय, राम सुधार सिंह सैंथवार, जगदीश खेतान, मधुसूदन पांडेय, राम नरेश शर्मा शामिल रहलें।