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बशीर बद्र स्मृति शेष : वो अपने घर चला गया अफसोस मत करो...

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गोरखपुर। वो अपने घर चला गया अफसोस मत करो, इतना ही उसका साथ था अफसोस मत करो...।
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बशीर बद्र की लिखी इन पंक्तियों को उन्हीं को समर्पित करते हुए गोरक्षनगरी ने उन्हें नमन किया, उन्हें याद किया। शेर-ओ-शायरी की महफिल जब-जब जमी, जब उन्हें बुलाया गया वे फिराक गोरखपुरी की इस सरजमीं पर आए जरूर। अपनी बेबाक शायरी, संवेदनशील गजलों और आम आदमी की भावनाओं को खूबसूरती से बयान करने की कला के कारण वह हर दिल अजीज रहे। गोरक्षनगरी में उनका कई बार आगमन हुआ और यहां उनके चाहने वालों की लंबी फेहरिस्त रही। वे अब अपनी अंतिम यात्रा पर हैं, पर यहां के लोगों को हमेशा याद आएंगे।

उन्होंने कहा- पैसे की चिंता न करो, स्कूल से क्या लेना
महात्मा गांधी इंटर कॉलेज के प्रबंधक मंकेश्वर नाथ पांडेय इन दिनों फिनलैंड में हैं। फोन करते ही कहा कि, खबर सुनी। बशीर साहब अब शायरी-गजलों में रहेंगे हमारे पास। पुरानी यादों के खजाने से कुछ किस्से निकालते हुए कहा कि 2009 में कॉलेज का शताब्दी वर्ष समारोह था। इसे भव्य ढंग से मनाया गया था। शाम को कवि सम्मेलन एवं मुशायरे का आयोजन किया गया था। इसमें गोपाल दास नीरज, सोम ठाकुर, बशीर बद्र और वसीम बरेलवी जैसे दिग्गजों को आमंत्रित किया गया था। बशीर बद्र को फोन पर ही आमंत्रित किया गया था। उन्होंने स्कूल के शताब्दी वर्ष समारोह में आने के लिए न सिर्फ सहर्ष स्वीकृति दी बल्कि यह कहकर शुल्क बहुत कम लिया कि स्कूल से क्या पैसा लेना। बशीर बद्र को सुनने के लिए शहर के साथ ही आसपास के जनपदों के लोग भी आए थे। देर रात तक कवि सम्मेलन एवं मुशायरा चला था। स्कूल का मैदान पूरा भरा हुआ था। बशीर बद्र बहुत शरीफ और सभी को सम्मान देने वाले व्यक्ति थे। उनका जाना साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।
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आज भी संभालकर रखी है उनकी भेंट की हुई सदरी
मशहूर शायर कलीम कैसर ने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में कई बार उनके साथ मंच साझा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गोरखपुर में वह कई बार आए। अंतिम बार 2009 में आए थे। उससे पहले फर्टिलाइजर में आयोजित मुशायरे में वे कई बार आए थे। वर्ष 2009 में एमजी इंटर कॉलेज में ही उन्होंने अपनी सदरी मुझे भेंट की थी। आज भी वह सदरी मैंने संभालकर रखी है। वर्ष 2012 में अंतिम बार उनसे उनके भोपाल स्थित आवास पर मुलाकात हुई थी। वर्ष 2005 में बिहार के बख्तियारपुर में उन्होंने मेरी पहली किताब ''''बीर बहूती'''' की समीक्षा की थी। वह बहुत अच्छे शायर और उससे भी बेहतर इंसान थे। उनसे जीवन में बहुत कुछ सीखने को मिला।
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आम लोगों की बातें सलीके से कह जाते थे

शायर मोहम्मद सिद्दीक ने बशीर बद्र की उपलब्धियों को याद करते हुए कहा कि आम लोगों से जुड़ी बातों को खूबसूरती और सलीके से कह जाना उनकी खासियत थी। ''''लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में'''' जैसीं रचनाएं देकर उन्होंने लोगों के दिलों में खास जगह बनाई। लखनऊ में करीब 20 वर्ष पहले एक बार उनसे मुलाकात हो पाई थी। वह मुलाकात आज भी याद आती है। वह बड़े शायर होने के साथ ही मिलनसार भी थे। पहली बार मिलने पर भी इस तरह घुल-मिल जाते थे कि लगता ही नहीं था कि यह पहली मुलाकात है।
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