चार फरवरी 1922 को बेकसूरों पर अंग्रेजी सिपाहियों ने गोली बरसाया था। जिसमें कुछ आंदोलनकारी शहीद हो गए थे। भीड़ ने चौरीचौरा थाने को घेरकर आग के हवाले कर दिया था। जिसमें दर्जनों अंग्रेजी सिपाही मारे गए थे। चौरीचौरा कांड से दुखी होकर महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस लेने का फैसला किया था। 1928 में एक बार फिर बापू का पूर्वांचल में आना हुआ था। जिन्होंने अनंत आश्रम में 15 मिनट के अधिवेशन को संबोधित किया था। आजदी की लड़ाई में लोगों ने उनका पुरजोर सहयोग किया था।
अनंत आश्रम में बाबा राघवदास द्वारा क्रांति के महानायक पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की समाधिस्थली बनवाया गया है। जहां हर वर्ष उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। बताया जाता है कि फांसी से पूर्व बिस्मिल ने अपना मृत शरीर बाबा राघवदास को सौंपने की इच्छा जाहिर किया गया था।
1942 में आजाद हो गया था बरहज
स्वतंत्रता आंदोलन में नगर क्षेत्र का भी योगदान रहा है। जहां अंग्रेजों के खिलाफ पैना की सैकड़ों महिलाओं ने जौहर दिखाते हुए शहीद हो गई थीं। वहीं 14 अगस्त 1942 को सरयू में विलीन हो चुका गांव कुरह परसियां निवासी स्व.लक्ष्मी मिश्र के तीसरे नंबर के पुत्र पंडित विश्वनाथ मिश्र और बरौली निवासी जगन्नाथ मल्ल ने समर्थकों के साथ तिरंगा फहराकर बरहज को आजाद घोषित कर दिया था। जहां कैप्टन मूर की गोली से दोनों रणबांकुरे शहीद हो गए थे। लोगों की मानें तो आजादी के 72 साल बाद भी अनंत आश्रम में स्थापित पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की समाधिस्थली, मुख्य चौक पर पंडित विश्वनाथ मिश्र, जगन्नाथ मल्ल और पैना शहीद स्थली उपेक्षाओं का शिकार है।