-''''भोजपुरी संगम'''' की 165 वीं ''''बइठकी'''' का आयोजन
संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। भोजपरीु संगम की 165वीं ''''बइठकी'''' दीपावली के दूसरे दिन सोमवार को खरैया पोखरा, बशारतपुर स्थित कार्यालय पर हुई। जिसमें कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में फैली कुरीतियों व विषमताओं पर करारा प्रहार किया।
बइठकी के प्रथम सत्र में रवींद्र श्रीवास्तव ''''जुगानी'''' के भोजपुरी साहित्यिक अवदान पर विस्तार से चर्चा की गई। रवींद्र मोहन त्रिपाठी ने कहा कि जुगानी अपने गांंव, शहर कस्बे में जिंदगी का रेशा-रेशा देखते हैं। इनकी रचनाओं में भोजपुरी के पुरातन शब्दों, मुहावरों एवं कहावतों का सटीक व सफलतम उपयोग है।
डॉ. फूलचंद प्रसाद गुप्त ने कहा कि भोजपुरी साहित्य को एक आंदोलन के रूप में स्थापित करने वाले गिने चुने लोगों में जुगानी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है।
बइठकी का द्वितीय कवितई सत्र रचनाओं से समृद्ध रहा। अवधेश ''''नंद'''' ने अपने दोहों में गहन चिंतन व्यक्त करते हुए कहा कि ''''कांपि-कांपि धरती कहति, भार होत बा ढेर। परदूसन के रोकि लऽ, ''''नंद'''' हो रहल देर। ''''निखिल पांडेय ने भोजपुरी गजल...देह दुनिया से लड़ि के घर पहुंचल, मन बजरिये में हार बइठल बा। पढ़कर खूब वाहवाही लूटी।
अरविंद ''''अकेला'''' ने अपनी रचना में विलुप्त हुए गांव को तलाशना चाहा...कहां गइल ऊ महकत धरती, चहंकत सांझ-बिहान, हमरो गउवां रहल महान। वीरेंद्र मिश्र ''''दीपक'''' के गीत ने भोजपुरी को नई ऊंचाई दी....कवने माया में भुलाइल बाड़ऽ तोता हो, खोतौना छोड़ के जाए के परी।
इसके अलावा अजय कुमार यादव, ओम प्रकाश पांडेय, डॉ. फूलचंद प्रसाद गुप्त, चंद्रेश्वर ''''परवाना'''', सुभाष चंद्र यादव, राजेश ''''राज'''', संयोजक कुमार अभिनीत ने अपनी रचना की प्रस्तुति की। अध्यक्षता वागीश्वरी मिश्र ''''वागीश'''' एवं संचालन धर्मेंद्र त्रिपाठी ने किया।