विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष दिनेश चंद त्रिपाठी कहते हैं, उनके दौर में हिंसा की घटनाएं होती रहीं है। एक बार दो ब्राह्मण-क्षत्रिय के बीच संघर्ष ने इतना विकराल रूप ले लिया कि दोनों पक्ष आमने-सामने थे और बीच में पुलिस। दोनों तरफ से पथराव भी हुए। लेकिन कुलपति व अधिकारियों से अभद्रता नहीं होती थी। वह कहते हैं, इसका दूसरा पहलू संवादहीनता और तानाशाही है। यह घटना अचानक नहीं है बल्कि कई महीनों से बन रहे माहौल का परिणाम भी है।
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छात्रसंघ चुनाव न कराने से भी सभी गुटों में थी नाराजगी
विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव न कराने से भी सभी छात्र संगठनों में नाराजगी रही है। सभी छात्र संगठनों और छात्रनेताओं हंगामा भी किया। तालाबंदी से लेकर प्रदर्शन तक किए गए। कुलपति द्वारा छात्रों से कम संवाद करना भी नाराजगी की बड़ी वजह बताई जा रही है।
गोरखपुर पूर्व कुलपति प्रो. आरके मिश्रा ने कहा कि विश्वविद्यालय की घटना की वीडियो देखा हूं। बहुत ही कष्ट हुआ। गुरु-शिष्य के रिश्तों का कत्ल आज कैसे हो रहा है, इसे देखकर महसूस हुआ। जो पार्टी सत्ता में है, उसके आनुषंगिक संगठन ऐसा करें तो बहुत ही निंदनीय है। इसका सीधा अर्थ है कि हम पॉवर में है तो हर व्यक्ति हमारी सुने। इसी मानसिकता से संगठन काम कर रहे हैं। हमारे समय भी बवाल होते थे पर इस तरह नहीं। यह तो जैसे पेशेवर लोग हों। सरकार को इस पर कड़ा रुख अपनाना चाहिए।
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गोरखपुर विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष प्रो. चितरंजन सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय के इतिहास में यह घटना बहुत ही दुखद और निंदनीय है। लोकतांत्रिक मर्यादाओं का इस तरह हनन में मैंने पहले कभी नहीं देखा। लेकिन इस माहौल के लिए सिर्फ छात्र ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि कुलपति ने भी इसे हवा दी है। एक अध्यापक पर प्राणघातक हमला हुआ है। विश्वविद्यालय अराजकता का अड्डा बन गया है। मेरी मांग है कि राज्य सरकार इसकी उच्चस्तरीय जांच कराए और जो भी जिम्मेदार हो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।