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Gorakhpur News: कुछ साल बाद ह्वाट्सएप स्टेटस तक सीमित रह जाएगी होली

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एकल परिवार और महिलाओं की व्यस्तता ने बदल दिया त्योहर का स्वरूप
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- युवा पीढ़ी रंग और उमंग में डूबने के बजाय गुलाल लगाकर ह्वाट्स स्टेटस में करती है यकीन
- बुजुर्ग पीढ़ी खत्म होती परंपरा को लेकर चिंतित, नशे से भी बिगड़ रहा माहौल


अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। गीता प्रेस में आयोजित एक कार्यक्रम में साहित्यकार पं. विद्यानिवास मिश्र ने कहा था कि संपन्नता व्यक्तिगत उल्लास की बलि मांगती है। हालांकि, यह बात उन्होंने किसी अन्य संदर्भ में कही थी, लेकिन उसका होली जैसे उल्लासपूर्ण त्योहार पर आज सीधा असर दिख रहा है। महज तीन दशक पहले तक जब लोग संसाधनों के लिए जूझ रहे थे, तब होली व्यक्ति या घर नहीं, बल्कि पूरे समाज को नई उर्जा दे रजी थी। वहीं दुनिया की पांचवीं बड़ी आर्थिक शक्ति का तमगा हासिल करने के बाद यह त्योहार अब रस्म अदायगी की तरफ बढ़ने लगा है। स्थिति यह है कि फाल्गुन मास की समाप्ति पर मनाए जाने वाले त्योहार होली में केवल तीन दिन शेष हैं और रंग केवल बाजार में ही दिख रहा है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में होली केवल सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर स्टेटस सिंबल बनकर रह जाएगी।
फाल्गुन मास जीवन में उल्लास का प्रतीक है। इस महीने पेड़ पौधे भी रंगीन हो जाते हैं। लेकिन, बीते तीन दशक में यह महीना भी अन्य दिनों की तरह ही हो गया है। इस महीने का खास त्योहार होली का स्वरूप भी काफी बदल चुका है। वसंत पंचमी के दिन से शुरू होने वाला फगुआ (होली गीत) अब केवल होली के दिन ही होता है। गोरखपुर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत शिक्षक प्रो. चितरंजन मिश्र होली की चर्चा छिड़ते ही अतीत में खो जाते हैं। कहते हैं कि बचपन से लेकर आज तक जितना बदलाव होली में देखा है, उतना किसी और में नहीं दिखा। फगुआ गाने वाली टोलियां शहर ही नहीं गांव में भी खत्म हो चुकी हैं। अगर किसी को इससे सुनने का शौक है भी तो वह इसे यू ट्यूब पर सुन व देख सकता है। प्रत्यक्ष दिखना बड़ा मुश्किल है। रंग-अबीर से अधिक चिंता दूसरे अन्य पदार्थों को लेकर है। पुरानी पीढ़ी ने नई पीढ़ी को परंपरा सिखाई नहीं। अब नई पीढ़ी बस होली के दिन स्टाइल में गुलाल लगाकर फोटो सोशल मीडिया पर डालकर खुद को कमरे में कैद कर लेती है। यही होली बची है।
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सिनेमा ने बदल दिया फगुआ का स्वरूप
जीवन में 80 वसंत देख चुके वरिष्ठ साहित्यकार रविंद्र श्रीवास्तव जुगानी भाई कहते हैं कि पूर्वांचल में होली के गीतों को कवि रंगपाल ने लिपिबद्ध किया था। फगुआ वाचिक पंरपरा का साहित्य है। कहा जाता है कि साग नीक तोरी (सरसों) के आ राग नीक होरी (फगुआ) के। मतलब फगुआ के बोल हमेशा कर्णप्रिय होते थे। लेकिन फिल्मों ने इस त्योहार के रीति-नीति में बड़ा बदलाव किया। सूखी होली, गले पर दो अंगुली से निशान लगाने वाली होली तो फिल्मों से ही आई। अश्लील गीतों ने इसकी मिठास को गंदा कर दिया। नतीजतन लोग दूर होते चले गए। आज भी लोग फगुआ सुनना चाहते हैं, लेकिन मजबूरी है कि पुराने गाने वाले नहीं बचे। इसलिए लोग यू ट्यूब पर पुराने गाने गुनगुनाते हैं।
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एकल परिवारों से कमजोर हुए रिश्ते
शहर के हनुमंतनगर इलाके की रहने वाली रंजुला रावत का कहना है कि अब परिवार छोटे हो गए। पति-पत्नी कामकाजी हैं। ऐसे में उन्हें त्योहार के लिए पकवान बनाने से लगायत अन्य परंपराओं को निभाने की फुर्सत नहीं है। ऐसे में केवल वही काम हो पा रहे हैं, जिन्हें आसानी से किया जा सके। बच्चे पढ़ने बाहर चले गए तो मां-बाप को न तो खाना अच्छा लगता है और न ही अन्य कार्य। वही बच्चे भी अपनी जड़ों से दूर हो चुके हैं। तमाम ऐसे हैं जिन्होंने गांव केवल साल में एक दिन के लिए देखा है। ऐसे में वे अपनी परंपरा को लेकर कितना जागरूक हो सकते हैं। यह तो हमारी जिम्मेदारी है कि हर त्योहार पर ही अपने बच्चों को गांव लेकर जाएं। जिससे कि वे अपनी परंपरा और उसके महत्व को समझ सकें।

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