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Gita Press: गीता प्रेस में गांधीजी के सुझाव पर नहीं छापते विज्ञापन, लागत से आधे दाम पर बिकती हैं पुस्तकें

Tue, 20 Jun 2023 01:39 PM IST
vivek shukla संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर।

सार

ट्रस्टी गीता प्रेस देवी दयाल अग्रवाल ने कहा कि गीताप्रेस की स्थापना के समय ही संस्थापक जयदयाल गोयंदका ने आय के श्रोतों की व्यवस्था कर दी थी, ताकि भगवान की सेवा में कभी भी किसी तरह का विघ्न न आए और समाज के अंतिम व्यक्ति तक भगवान की वाणी धार्मिक पुस्तक के रुप में पहुंच सके।
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गोरखपुर गीता प्रेस। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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गीता प्रेस ने अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष पूरा हो चुका है। बावजूद इसके आज तक कभी गीता प्रेस ने विज्ञापन नहीं छापा। जब मासिक धार्मिक पत्रिका कल्याण के प्रकाशन की बात चल रही थी तब उसके संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार को महात्मा गांधी ने सुझाव दिया कि इस पत्रिका में कभी विज्ञापन मत छापिएगा। उन्होंने पुस्तक समीक्षा भी न छापने का सुझाव दिया था।

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गीता प्रेस का नाम लेते ही हर किसी के जेहन में शुद्ध, सस्ती, आकर्षक और वैचारिक संदेश देने वाली पुस्तकें घूमने लगती हैं। दरअसल, आज के वैश्विक दुनिया में सादगी, आध्यात्मिक और गैर राजनैतिक कार्य पद्धति ही गीता प्रेस की पहचान है। यही वजह है कि स्थापना काल से अब तक 100 वर्ष की अपनी रचनात्मक यात्रा में गीता प्रेस प्रबंधन ने खुद को हमेशा व्यावसायिक दृष्टिकोण से अलग रखा। अगर प्रबंधतंत्र की तरीका सीखना है तो गीता प्रेस इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

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बिना लाभ और हानि के सिद्धांत पर काम कर रही यह संस्था पूरी दुनिया में धार्मिक पुस्तकें पहुंचा रही है। बहुत ही कम लोग जानते हैं कि गीता प्रेस लागत से 30 से 60 फीसदी तक कम दाम पर पुस्तकें उपलब्ध कराता है। आय और व्यय का संतुलन बना रहे इसके लिए प्रबंधन ने आय के अन्य संसाधन भी विकसित किए हैं। ऋषिकेश में आयुर्वेद की फैक्ट्री, कई शहरों में कपड़े की दुकानें खुली हैं, इनसे होने वाली आय से भी घाटे की भरपाई की जाती है।

प्राचीन हस्त लिखित श्रीमद्भागवत गीता को मैग्नीफाइंग ग्लास से देखते लोग। - फोटो : अमर उजाला।
समय के साथ गीता प्रेस ने प्रिंटिंग की मशीने भी आधुनिक की है। अब यहां प्रिंटिंग के लिए जापान की कोमोरी और सिलाई के स्विटजरलैंड के आधुनिक सिलाई मशीन का प्रयोग किया जा रहा है। दरअसल, गीताप्रेस, गोविंद भवन कार्यालय ट्रस्ट, कोलकाता की एक इकाई है। यह ट्रस्ट नो प्राॅफिट नो लॉस के सिद्धांत पर कार्य करता है। गीताप्रेस घाटे से प्रभावित हुए बिना धर्म की सेवा के लिए पुस्तकों का प्रकाशन करता रहे, इसके लिए गोविंद भवन कार्यालय ट्रस्ट ने आय के अन्य संसाधनों का विकास किया। इस आय से गीताप्रेस का घाटा पूरा किया जाता है।

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इसके लिए कपड़ों की तीन दुकानें गोरखपुर, कानपुर व ऋषिकेश में खोली गईं, जो आज भी नियमित आय का बड़ा स्रोत हैं। इसके अलावा गोरखपुर में करीब दस दुकानें गीताप्रेस भवन में हैं जो किराए पर दी गई हैं। ऋषिकेश में आयुर्वेद दवाओं की एक फैक्ट्री भी लगाई गई है, जो फायदे में रहती हैं। वहीं, अगर पुस्तक का एक संस्करण निकल गया, इसके बाद कागज के दाम में गिरावट आ गई तो भी गीताप्रेस दूसरे संस्करण की पुस्तक का दाम कम नहीं करता है, ताकि बाजार का संतुलन बना रहे। इससे होने वाली बचत से भी गीताप्रेस का कुछ घाटा पूरा हो जाता है।

 
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एक रुपये से 1500 रुपये तक की हैं पुस्तकें

गोरखपुर गीता प्रेस। - फोटो : अमर उजाला।
गीता प्रेस में आज भी सबसे सस्ती पुस्तक एक रुपये में में संपूर्ण गीता व दो रुपये में हनुमान चालीसा पाठकों को उपलब्ध कराता है। गीताप्रेस से प्रकाशित अभी तक की सबसे महंगी पुस्तक 200 चित्राें के साथ प्रकाशित होने वाली शिव महापुराण होगी। इसकी कीमत 1500 रुपये रखी गई है। आर्ट पेपर पर छपने वाली ये पुस्तक में 1,088 पृष्ठों है।

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शताब्दी वर्ष में किया 100 करोड़ की पुस्तकों का प्रकाशन
29 अप्रैल, 1923 को गीता प्रेस की स्थापना हुई थी। 100 वर्षों से गीताप्रेस लोगों में अनवरत आध्यात्मिक चेतना को समृद्ध कर रहा है। इस डिजिटल युग में भी गीताप्रेस के पाठकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अपने 100वें यानी शताब्दी वर्ष में अब तक का अपना ही रिकार्ड तोड़ा है और 100 करोड़ रुपये मूल्य से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन किया है।

ट्रस्टी गीता प्रेस देवी दयाल अग्रवाल ने कहा कि गीताप्रेस की स्थापना के समय ही संस्थापक जयदयाल गोयंदका ने आय के श्रोतों की व्यवस्था कर दी थी, ताकि भगवान की सेवा में कभी भी किसी तरह का विघ्न न आए और समाज के अंतिम व्यक्ति तक भगवान की वाणी धार्मिक पुस्तक के रुप में पहुंच सके। गोयंदका के बाद जो भी लोग भी इस सेवा कार्य के लिए आए, उन्होंने इसी सिद्धांताें पर काम करते हुए परंपरा को आगे बढ़ाया है।


 
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