प्राचीन हस्त लिखित श्रीमद्भागवत गीता को मैग्नीफाइंग ग्लास से देखते लोग।
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समय के साथ गीता प्रेस ने प्रिंटिंग की मशीने भी आधुनिक की है। अब यहां प्रिंटिंग के लिए जापान की कोमोरी और सिलाई के स्विटजरलैंड के आधुनिक सिलाई मशीन का प्रयोग किया जा रहा है। दरअसल, गीताप्रेस, गोविंद भवन कार्यालय ट्रस्ट, कोलकाता की एक इकाई है। यह ट्रस्ट नो प्राॅफिट नो लॉस के सिद्धांत पर कार्य करता है। गीताप्रेस घाटे से प्रभावित हुए बिना धर्म की सेवा के लिए पुस्तकों का प्रकाशन करता रहे, इसके लिए गोविंद भवन कार्यालय ट्रस्ट ने आय के अन्य संसाधनों का विकास किया। इस आय से गीताप्रेस का घाटा पूरा किया जाता है।
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इसके लिए कपड़ों की तीन दुकानें गोरखपुर, कानपुर व ऋषिकेश में खोली गईं, जो आज भी नियमित आय का बड़ा स्रोत हैं। इसके अलावा गोरखपुर में करीब दस दुकानें गीताप्रेस भवन में हैं जो किराए पर दी गई हैं। ऋषिकेश में आयुर्वेद दवाओं की एक फैक्ट्री भी लगाई गई है, जो फायदे में रहती हैं। वहीं, अगर पुस्तक का एक संस्करण निकल गया, इसके बाद कागज के दाम में गिरावट आ गई तो भी गीताप्रेस दूसरे संस्करण की पुस्तक का दाम कम नहीं करता है, ताकि बाजार का संतुलन बना रहे। इससे होने वाली बचत से भी गीताप्रेस का कुछ घाटा पूरा हो जाता है।
गीता प्रेस में आज भी सबसे सस्ती पुस्तक एक रुपये में में संपूर्ण गीता व दो रुपये में हनुमान चालीसा पाठकों को उपलब्ध कराता है। गीताप्रेस से प्रकाशित अभी तक की सबसे महंगी पुस्तक 200 चित्राें के साथ प्रकाशित होने वाली शिव महापुराण होगी। इसकी कीमत 1500 रुपये रखी गई है। आर्ट पेपर पर छपने वाली ये पुस्तक में 1,088 पृष्ठों है।
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शताब्दी वर्ष में किया 100 करोड़ की पुस्तकों का प्रकाशन
29 अप्रैल, 1923 को गीता प्रेस की स्थापना हुई थी। 100 वर्षों से गीताप्रेस लोगों में अनवरत आध्यात्मिक चेतना को समृद्ध कर रहा है। इस डिजिटल युग में भी गीताप्रेस के पाठकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अपने 100वें यानी शताब्दी वर्ष में अब तक का अपना ही रिकार्ड तोड़ा है और 100 करोड़ रुपये मूल्य से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन किया है।
ट्रस्टी गीता प्रेस देवी दयाल अग्रवाल ने कहा कि गीताप्रेस की स्थापना के समय ही संस्थापक जयदयाल गोयंदका ने आय के श्रोतों की व्यवस्था कर दी थी, ताकि भगवान की सेवा में कभी भी किसी तरह का विघ्न न आए और समाज के अंतिम व्यक्ति तक भगवान की वाणी धार्मिक पुस्तक के रुप में पहुंच सके। गोयंदका के बाद जो भी लोग भी इस सेवा कार्य के लिए आए, उन्होंने इसी सिद्धांताें पर काम करते हुए परंपरा को आगे बढ़ाया है।