गोरखपुर। प्रख्यात पर्यावरणविद व पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि जीवन बचाने के लिए मिट्टी, हवा और पानी अनिवार्य हैं। यही तत्व ''विशाल भारत'' और विश्व के भूगोल को बदलेंगे। प्रकृति को नहीं, हमें खुद को बचाने की आवश्यकता है।
वह शनिवार को दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग की ओर से आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। ''विशाल भारत'' विषय पर भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) की ओर से आयोजित सेमिनार में उन्होंने कहा कि ''विशाल भारत'' का वास्तविक अर्थ भारत की विशालता (नैतिक और प्राकृतिक) से है।
आज जियो टैगिंग तो चलन में है लेकिन वास्तविक भूगोल कहीं गायब है। भूगोल को केवल जमीन का टुकड़ा न समझें। आज हमारे पहाड़ों का स्वरूप कूड़े के ढेरों में बदल रहा है, जो हमारी मानसिकता में आए बदलाव का प्रतीक है। उन्होंने चेताया कि ज्ञान, बाजार और धर्म ही एकीकरण और भेदभाव दोनों के कारण रहे हैं। हम केवल उपभोक्ता बन रहे हैं, योगदानकर्ता नहीं।
अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि पर्यावरण के वैश्विक संकट के बीच नौका विहार जैसे स्थल भौगोलिक और पर्यावरणीय संतुलन के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। हमें प्राचीन ज्ञान को आज की आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर भूगोल को समझना होगा।
जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि केवल शहरीकरण पर ध्यान देना और ग्रामीण विकास को छोड़ देना ही विनाश का कारण है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान से जोड़ते हुए कहा कि ''कर्मकांड'' वास्तव में ''गूगल अर्थ'' का ही एक पुरातन स्वरूप है।
जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया के कुलपति प्रो. संजीत गुप्त ने कहा कि सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ें ही विशाल भारत की वास्तविक नींव हैं। डीडीयू के भूगोल विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. जगदीश सिंह ने भी विचार रखे। स्वागत विभागाध्यक्ष प्रो. एसके सिंह ने किया। कार्यक्रम संयोजक डॉ. अंकित सिंह ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। डॉ. श्रीप्रकाश सिंह आभार ज्ञापित किया। पहले दिन दो तकनीकी सत्र भी आयोजित किए गए। इनमें पद्मश्री डॉ. राम चेत चौधरी, डॉ. रुचिका सिंह आदि ने विचार रखे। डॉ. दीपेंद्र मोहन सिंह ने संचालन किया।