मां… यह केवल एक शब्द नहीं, यह सम्पूर्ण सृष्टि का सार है। वह आदिशक्ति है जो जीवन को जन्म देती है, जो दर्द को अपने भीतर समेटकर मुस्कान बिखेरती है, जो रात के घुप्प अंधेरे में भी अपनी आंखों की रोशनी से दूसरों का रास्ता रोशन करती है। संसार में आने से पहले ही जिसकी धड़कनों की लय हमारे अस्तित्व का संगीत बन जाती है, वह मां ही होती है। उसके आंचल में केवल वात्सल्य नहीं होता, पूरी सृष्टि की करुणा, त्याग और सुरक्षा का विस्तार बसता है। इसलिए किसी भी समाज की वास्तविक संवेदनशीलता इस बात से मापी जाती है कि वहां मातृत्व कितना सुरक्षित, सम्मानित और संरक्षित है। उत्तर प्रदेश ने बीते वर्षों में इसी संवेदनशील सोच को शासन की प्राथमिकता के रूप में साकार किया है। राज्य सरकार की योजनाओं में इनका प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देता है।
विश्व मातृ दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि उस अनंत ऋण को स्मरण करने का दिन है, जिसे कोई संतान कभी चुका नहीं सकती। यह दिन हमें याद दिलाता है कि मातृ सुरक्षा केवल स्वास्थ्य सेवाओं का विषय नहीं, बल्कि मानवीय सभ्यता की आत्मा से जुड़ा प्रश्न है। जब कोई गर्भवती महिला सुरक्षित प्रसव के विश्वास के साथ अस्पताल तक पहुंचती है, जब किसी नवजात की पहली किलकारी मां की मुस्कान से मिलती है, तब वहां केवल एक परिवार नहीं, पूरा समाज आश्वस्त होता है। कभी मातृ मृत्यु दर, कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे गंभीर प्रश्नों से जूझने वाला यह विशाल प्रदेश आज मातृ सुरक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन की नई कहानी लिखता दिखाई देता है।
दशकों तक उत्तर प्रदेश के लिए मातृ मृत्यु दर एक ऐसा कलंक था जो इस महान धरती के माथे पर लगे रक्त के दाग की तरह था। प्रसव की पीड़ा में तड़पती मांएं जिनकी सांसों का दीया अस्पताल की देहरी तक पहुंचने से पहले ही बुझ जाता था। फिर आया बदलाव का दौर। 2017 में संस्थागत प्रसव 67 प्रतिशत था जो अब 97 प्रतिशत के करीब है?
इसके लिए व्यापक और समन्वित प्रयास किए गए जिसके बारे में पहले सोचा तक न जाता था। सबसे पहले 102 और 108 एम्बुलेंस सेवाओं को विस्तार दिया गया।। आज प्रदेश में 102 सेवा के अंतर्गत 2,270 एम्बुलेंस और 108 सेवा के तहत 2,200 एम्बुलेंस दिन-रात दौड़ती हैं। वे गांव जहां पहले प्रसव पीड़ा में कराहती मां को खाट पर लेकर कोसों दूर ले जाया जाता था, वहां अब एम्बुलेंस की आवाज़ आशा की नई इबारत लिखती है। 108 एंबुलेंस सेवा ने चार करोड़ लोगों को लाभ पहुंचाया है जो सरकार की उस प्रतिबद्धता का प्रमाण है जो हर मां को सुरक्षित देखना चाहती है। जननी सुरक्षा योजना इस बदलाव की रीढ़ बनी। इस योजना के अंतर्गत गर्भवती महिलाओं को संस्थागत प्रसव के लिए सीधे आर्थिक सहायता दी जाती है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के साथ मिलाकर यह राशि एक गर्भवती मां के लिए जीवन रक्षक सहायता बन जाती है। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान ने गर्भवती माताओं के लिए निःशुल्क जांच का एक ऐसा संकल्प दिया जो नियमितता और विश्वसनीयता का प्रतीक बन गया। मिशन इन्द्रधनुष ने टीकाकरण को एक जन-आंदोलन का स्वरूप दिया तो पोषण अभियान ने उस बुनियाद को मजबूत किया जिस पर स्वस्थ मातृत्व टिकता है। मुख्यमंत्री मातृत्व अमृत योजना के अंतर्गत पोषण किट और नकद सहायता देकर, और आंगनबाड़ी के माध्यम से पूरक आहार पहुंचाकर गर्भवती और धात्री माताओं के पोषण पर विशेष ध्यान दिया गया।
किन्तु यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई। शिशु मृत्यु दर और, नवजात मृत्यु दर को और कम करके राष्ट्रीय लक्ष्य तक पहुंचाना है। ग्रामीण-शहरी स्वास्थ्य असमानता अभी भी एक चुनौती है। विशाल जनसंख्या और व्यापक भौगोलिक विस्तार वाले इस राज्य में हर एक जान को सुरक्षित करना एक निरंतर चलने वाला महायज्ञ है। अब तक का सफर यह विश्वास दिलाता है कि उत्तर प्रदेश सही दिशा में अग्रसर है।
(ये लेखिक के निजी विचार हैं। लेखिका डॉ आशा राठी वरिष्ठ महिला रोग विशेषज्ञ हैं।)