संत रविदास के 650वें जयंती वर्ष पर भदोही का नाम संत रविदास नगर कर दिया गया। भदोही के लिए भी यह गौरव की बात है। अब यह जिला सामाजिक समरसता के अग्रदूत के रूप में दिखाई देगा। संत रविदास ने अपने समय में जाति और वर्ण के उन बंधनों को चुनौती दी थी, जिनकी वजह से समाज का एक बड़ा वर्ग शिक्षा और सम्मान के अवसर से वंचित था। उनके नाम पर जिले का नामकरण इस बात का प्रतीक है कि योगी सरकार भी जाति और वर्ण के आधार पर नहीं, समभाव से और सबके विकास के लिए संकल्पशील है।
वस्तुतः सीएम योगी का प्रयास मुगलकालीन या औपनिवेशिक नामों को हटाने तक सीमित नहीं, बल्कि उन गुमनाम वीरांगनाओं और लोकनायकों को राष्ट्रीय स्मृति में रखने का है जिन्हें दशकों तक इतिहास की मुख्यधारा से बाहर रखा गया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पासी समाज की वीरांगना ऊदा देवी का ही उदाहरण लें, जिन्होंने लखनऊ के सिकंदरबाग में अंग्रेज सैनिकों के विरुद्ध अदम्य साहस दिखाया था। योगी सरकार ने न केवल लखनऊ में उनकी प्रतिमा स्थापित की, बल्कि एक महिला पीएसी बटालियन का नामकरण भी उनके नाम पर किया।
इसी तरह झांसी की रानी की सेनानायिका झलकारी बाई, जो कोरी (दलित) समुदाय से थीं, के नाम पर आगरा में महिला पीएसी बटालियन बनी। लोधी समाज की अवंती बाई के नाम पर भी बटालियन स्थापित हुईं। यह इन समाज के लोगों को एक संदेश है कि राष्ट्र-निर्माण में उनके पूर्वजों का योगदान राज्य की आधिकारिक स्मृति का हिस्सा है। यह सामाजिक न्याय की एक स्थायी उपस्थिति है।
इसी प्रकार राजभर समाज के गौरव महाराजा सुहेलदेव के नाम पर स्मारक, पर्यटन परियोजनाएं और सांस्कृतिक आयोजनों का विस्तार किया गया। इससे पूर्वांचल के अति पिछड़े समुदायों में एक नई पहचान का भाव जागृत हुआ। आदिवासी अस्मिता और भूमि अधिकारों के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले बिरसा मुंडा के नाम पर संग्रहालय और स्मृति परियोजनाएं विकसित की गईं।
शाहजहांपुर जिले के जलालाबाद कस्बे का नाम बदलकर भगवान परशुराम पुरी करना, अयोध्या जिले में नगर पंचायत खिलौनी-सुचितगंज को मां ज्वाला जी, कुशीनगर के फाजिलनगर का पावागढ़ और भदरसा को भरत नगर करना इसके उदाहरण हैं।
राष्ट्रीय अस्मिता के लिए प्रतिबद्ध सरकार का यह दायित्व होना चाहिए कि वह ऐसे प्रतीकों को सामने लाए जो भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनें। इतिहास के पन्नों को पलटें तो मुगलकाल में गाजीपुर, आजमगढ़, अलीगढ़, मुरादाबाद, इलाहाबाद, फतेहपुर, फिरोजाबाद, शाहजहांपुर और मुजफ्फरनगर जैसे अनेक बड़े जिलों के नाम मुगल सल्तनतों, उनके सेनापतियों और परिजनों के नाम पर रखे गए। आगरा को अकबराबाद कहा गया, प्रयागराज को इलाहाबाद कर दिया गया। यह एक सुनियोजित सांस्कृतिक विस्थापन था। इलाहाबाद का प्रयागराज बनना वहां के लोगों के लिए सबसे बड़ा गौरवबोध है। जिस भूमि पर गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का पवित्र संगम होता है, जहां हर बारह वर्ष में करोड़ों श्रद्धालु कुंभ स्नान के लिए उमड़ते हैं, उस नगर को एक ऐसा नाम ढोना पड़ा जिसका उसकी आध्यात्मिक चेतना से कोई नाता नहीं था। योगी सरकार में इस पौराणिक स्थल की आत्मा वापस आई है। इसी तरह फैजाबाद जिले का नाम बदलकर अयोध्या धाम करना भगवान श्रीराम की जन्मभूमि को उसका वास्तविक गौरव लौटाने जैसा कदम है। गोरखपुर, जो स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कर्मभूमि है, वहां भी उन्होंने उर्दू बाजार का नाम ‘हिंदी बाजार’, हुमायूंपुर का नाम ‘हनुमान नगर’, मियां बाजार का नाम ‘माया बाजार’ और अलीनगर का नाम ‘आर्य नगर’ किया। ये सभी परिवर्तन स्थानीय पहचान को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से पुनः जोड़ने का प्रयास हैं।
विपक्षी अक्सर यह तर्क देते हैं कि नामकरण की यह मुहिम असल मुद्दों, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य से ध्यान भटकाने की कोशिश है। परंतु यह तर्क तब कमजोर पड़ जाता है जब हम देखते हैं कि प्रतीक और नीति साथ-साथ चल रहे हैं। किसी समाज को यह अनुभव कराना कि उसका इतिहास राष्ट्र के गौरव का हिस्सा है, वह आत्मविश्वास पैदा करता है जो आगे चलकर शिक्षा और रोजगार में सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करेगा। जिस समाज को यह महसूस होता है कि उसके पूर्वज केवल हाशिये पर खड़े दर्शक नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण के सक्रिय सहभागी थे, वह समाज शिक्षा और प्रशासनिक भागीदारी में भी अधिक उत्साह से आगे आता है।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक अनिल चौधरी समाजसेवी और जाट महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)