बदलाव की यह तस्वीर उत्साहजनक है। कभी जिस महिला की पहचान उसके पति, पिता या बेटे के नाम से होती थी, वह आज अपने उद्यम और अपने ब्रांड के नाम से जानी जा रही है। यह महज नाम बदलने की बात नहीं, बल्कि समाज की बदलती सोच और महिला सशक्तीकरण के वास्तविक स्वरूप का प्रमाण है। किसी महिला की पहचान जब उसके अपने काम, हुनर और उपलब्धियों से बनने लगे, तो समझिए कि बदलाव की नींव मजबूत हो रही है।
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ग्रेटर नोएडा में आयोजित उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो के गलियारों से गुजरते हुए महसूस होता है कि सशक्तीकरण शब्द को यहां एक नया अर्थ मिल रहा है। यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि महिलाएं किसी मंच के कोने में खड़ी केवल व्यवस्थाएं संभालती या सजावट का हिस्सा बनती नजर नहीं आतीं, बल्कि अपने-अपने स्टॉल पर पूरे आत्मविश्वास के साथ मौजूद हैं। उनके स्टॉल पर सजे उत्पाद उनकी मेहनत, हुनर और सफलता की कहानी बयां कर रहे हैं।
जिन हाथों ने बरसों तक रसोई, खेतों और करघों पर चुपचाप मेहनत की, वही हाथ आज देशी-विदेशी खरीदारों से सौदे तय कर रहे हैं। यह उत्तर प्रदेश का एक नया चेहरा है। आत्मविश्वास से भरी महिलाएं, खरीदारों से संवाद करती युवतियां और बिजनेस-टू-बिजनेस बैठकों में अपनी बात मजबूती से रखते हुए संभावनाओं के नए द्वार तलाशती उद्यमी। नारी सशक्तीकरण का वास्तविक अर्थ यही है, जहां हर महिला अपनी विशिष्ट पहचान और स्वतंत्र अस्तित्व के साथ मौजूद है। वह किसी की कृपा की आकांक्षी नहीं, बल्कि अवसरों का सृजन करने वाली उद्यमी है। वह सहायता पाने वालों की कतार से आगे बढ़कर अब दूसरों के लिए रोजगार और आजीविका के अवसर पैदा कर रही है। इस तस्वीर की सबसे खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों की 75 महिला उद्यमी एक ही मंच पर अपने हुनर और उद्यम का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।
यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो पहली नजर में ही किसी अन्य व्यापार मेले से अलग नजर आता है। यहां स्टॉल हैं, उत्पाद हैं, खरीदार हैं और मोलभाव भी, लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो यह उस बदलाव की झलक भी है, जिसमें 'घर की महिला' की पहचान धीरे-धीरे एक सफल 'उद्यमी' के रूप में स्थापित हो रही है। आगरा की जरी-जरदोजी, अमरोहा के मसाले, अयोध्या की हर्बल चाय, आजमगढ़ की ब्लैक पॉटरी, कन्नौज का इत्र, गोरखपुर की टेराकोटा ज्वेलरी और बनारस के कालीन... इन उत्पादों के पीछे खड़ी हर महिला बदलते उत्तर प्रदेश की एक प्रेरक कहानी है।
गाजियाबाद की अंजलि इसका उदाहरण हैं। उन्हें चित्रकारी का शौक था। अक्सर घरेलू जिम्मेदारियों के बीच ऐसे शौक महज 'हॉबी' बनकर रह जाते हैं, लेकिन अंजलि ने अपने हुनर को उद्यम का रूप दिया। जिला ग्रामोद्योग विकास के माध्यम से ऋण लेकर उन्होंने सादे कपड़ों पर चित्रकारी का काम शुरू किया। आज उनके डिजाइन किए सूट, दुपट्टे, जींस और ट्राउजर दस-दस हजार रुपये तक की कीमत पर बिक रहे हैं। इससे भी अहम बात यह है कि उनके उद्यम से सात अन्य महिलाओं को नियमित रोजगार मिल रहा है। यहीं सशक्तीकरण का वास्तविक अर्थ सामने आता है। ऋण ने उनके उद्यम की शुरुआत का रास्ता खोला, लेकिन सात अन्य महिलाओं को रोजगार देकर उन्होंने अवसरों का दायरा बढ़ाया है।
जब सहायता पाने वाले हाथ दूसरों को सहारा देने लगें, तब समझिए कि बदलाव टिकाऊ रूप ले रहा है। निर्भरता से आत्मनिर्भरता की यह यात्रा महिला उद्यमिता को सामाजिक कल्याण के साथ-साथ आर्थिक भागीदारी से जोड़ने का परिणाम है। ट्रेड शो की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद केवल बिक्री के आंकड़ों में नहीं, बल्कि बाजार को समझने के मिले अवसरों में भी छिपी है। ट्रेड शो में 75 जिलों की 75 महिला उद्यमियों की भागीदारी इस बदलाव को व्यापक स्वरूप देती है।
नीतियों की सार्थकता इसी में है कि वे महिलाओं को आगे बढ़ने के अवसर दें और समय के साथ उन्हें अपने उद्यम का संचालन स्वतंत्र रूप से करने में सक्षम बनाएं। ट्रेड शो जैसे आयोजन इस प्रक्रिया को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बदलाव की यह तस्वीर उत्साहजनक है।
(अस्वीकरण: ये लेखिक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखिक प्रो. दीप्ति तनेजा, अर्थशास्त्री हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़ी हैं।)