भारतीय राजनीति में यह परंपरा रही है कि जब भी किसी महापुरुष का नाम किसी संस्था, सड़क या किसी बड़े भवन से जुड़ता है तो राजनीतिक दल उसे अपनी विचारधारा से जोड़ने में जुट जाते हैं। महात्मा गांधी, सरदार पटेल, डॉ. आंबेडकर, पं. दीनदयाल उपाध्याय या जय प्रकाश नारायण, पूरे राष्ट्र के साझा गौरव हैं। अब लोक नायक जय प्रकाश नारायण के नाम पर लखनऊ में बने इंटरनेशनल सेंटर (JPNIC) को क्रियाशील करने की प्रक्रिया शुरू हुई तो इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने के बजाय राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में देखा जाना चाहिए। लोकनायक का असली सम्मान तब होगा जब वह भवन जीवंत अवस्था में आए, उसमें सम्मेलन हो, लोग आएं-जाएं, राष्ट्रीय विमर्श और सांस्कृतिक गतिविधियां वहां दिखाई दें। उनका सम्मान वहां किसी राजनीतिक दल का झंडा फहराने से नहीं है।
किसी भी राष्ट्र या राज्य की सच्ची पूंजी वह होती है जो जनता के जीवन में उतरे, जो रोज़गार बने, जो पर्यटन को गति दे, जो शहर की पहचान बने। जब कोई भवन वर्षों तक बंद पड़ा रहता है, धूल फांकता है, रखरखाव के अभाव में जर्जर होता जाता है तो वह एक स्थायी दायित्व बन जाता है। जेपीएनआइसी इसी सोच की परीक्षा है।
सवाल अब यह नहीं रह गया कि इसकी कीमत ₹831 करोड़ है या कितनी, अहम सवाल यह है कि क्या इसे और दस साल, बीस साल यूं ही बंद पड़ा रहने दिया जाए, या इसे जनता के काम में लगाया जाए? जिस नाम पर यह केंद्र खड़ा है, वह नाम भारतीय राजनीति और समाज-सुधार के इतिहास में किसी एक विचारधारा या किसी एक दल की संपत्ति नहीं है।
लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने सत्ता के विरुद्ध जनता के पक्ष में खड़े होने का साहस दिखाया। आपातकाल के अंधकार में लोकतंत्र की मशाल जलाए रखी थी। यह विडंबना ही है कि जिस व्यक्तित्व ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा, आज उन्हीं के नाम पर बने केंद्र को दलगत राजनीति की परिधि में खड़ा किया जा रहा है।
जनता का पैसा, जनता की अपेक्षा
जेपीएनआइसी किसी व्यक्ति विशेष या किसी दल की निजी पूंजी से नहीं बना। यह जनता के पैसे बना है। इसकी एक-एक ईंट उस पैसे की है, जो आम नागरिक ने टैक्स के रूप में सरकार को दिया है। जब कोई सरकार करोड़ों रुपये खर्च करके भी किसी परियोजना को अधूरा छोड़ देती है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि जनता के साथ विश्वासघात है। संसाधनों को बंद ताले में छोड़ देना कोई नीति नहीं, यह एक तरह की वित्तीय लापरवाही है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। लापरवाही की हद को इस तरह समझा जा सकता है कि जेपीएनआईसी का निर्माण 2003 से 2007 के बीच शुरू हुआ था। वर्ष 2013 में इस परियोजना के लिए 200 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। परियोजना की लागत बढ़ते-बढ़ते करीब 850 करोड़ रुपये तक पहुंच गई, जबकि काम केवल 60 प्रतिशत ही पूरा हुआ। फिर भी योगी सरकार ने लोक कल्याण को प्राथमिकता देते हुए इसे संजीवनी देने का फैसला किया।
निष्क्रियता सबसे बड़ा अपराध
यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि जेपीएनआईसी को संचालन तक पहुंचाना उसका ‘बिक जाना’ है। यह सोच खोखली और आत्मघाती है। एक बंद पड़ी इमारत, जिसमें कोई गतिविधि नहीं, जिसका रखरखाव सरकारी बजट से लगातार खर्च मांगता है, जिसकी दीवारें समय के साथ कमजोर पड़ती जाती हैं, वह किसी काम की नहीं। निष्क्रियता कोई नैतिक स्थिति नहीं है, वह एक प्रशासनिक पाप है। जब एक विकल्प सामने आता है, जिसमें भवन का स्वामित्व सरकार के पास सुरक्षित रहेगा, निजी क्षेत्र उसका जीर्णोद्धार करेगा, उसे चालू करेगा और साथ ही सरकार को स्थायी राजस्व भी मिलेगा तो उस विकल्प नकारना खोखली सोच का ही परिचायक है।
आर्थिक व्यावहारिकता बनाम राजनीतिक प्रतीकवाद
हर सरकारी संपत्ति को हमेशा सरकार द्वारा ही संचालित करना संभव नहीं होता और न ही यह जरूरी है। दुनिया भर में सरकारें बुनियादी ढांचे, कन्वेंशन सेंटर, स्टेडियम और सांस्कृतिक केंद्रों के संचालन के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) का सहारा लेती हैं। तो क्या यह माना जाए कि उन्होंने अपनी संपत्ति बेच दी? यह निजी क्षेत्र की दक्षता, प्रबंधन कौशल और पूंजी का उपयोग कर के जनहित के लक्ष्य को तेज़ी से और बेहतर ढंग से हासिल करने का उपक्रम है।
(अस्वीकरण: अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक दिनेश प्रताप सिंह उत्तर प्रदेश भाजपा के मुख्य प्रवक्ता हैं।)