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विचार: अपराध के मलबे पर सुशासन के मंत्र

Sat, 17 Oct 2026 06:50 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला
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कसारी मसारी में आवासीय योजना का शुभारंभ करते सीएम योगी। - फोटो : अमर उजाला।
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किसी भी स्थान का नाम केवल कुछ अक्षरों का निर्जीव समूह नहीं होता, बल्कि वह उस क्षेत्र की अस्मिता, उसके इतिहास, उसकी सांस्कृतिक चेतना और वहां के निवासियों के सामूहिक मनोविज्ञान का जीवंत परिचायक होता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा प्रयागराज के कसारी-मसारी इलाके का नाम बदलकर 'कृष्णपुरी' करने की हालिया घोषणा को एक सामान्य प्रशासनिक नजरिए से देखना उचित नहीं होगा। 
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जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कसारी-मसारी का नाम 'कृष्णपुरी' करने की घोषणा की और वहां अतीक की कब्जाई जमीन पर गरीबों के फ्लैट बनाने के लिए भूमिपूजन किया, तो उन्होंने एक साथ कई संदेश दिए। भारतीय दर्शन और मिथकों में भगवान कृष्ण को हमेशा अन्याय, अत्याचार और आसुरी शक्तियों (कंस) के विनाशक के रूप में देखा गया है। 'कृष्णपुरी' नाम देना प्रतीकात्मक रूप से यह स्थापित करता है कि आधुनिक युग के इन 'कंसों' का अंत हो चुका है और अब यहां धर्म, न्याय और कानून का शासन होगा। 
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लूकरगंज में अतीक की जमीन पर गरीबों का घर, लखनऊ में मुख्तार की जमीन पर गरीबों के फ्लैट और अब कसारी-मसारी में भूमिपूजन और उसका नामकरण 'कृष्णपुरी' करना, ये तीनों घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही प्रशासनिक रणनीति के अहम हिस्से हैं। इसके निहितार्थ बहुत गहरे और व्यापक हैं। पहला निहितार्थ यह है कि सरकार यह संदेश दे रही है कि वह अपराधियों से सिर्फ जमीन छीन नहीं रही है, बल्कि उस संपत्ति को समाज के सबसे निचले और वंचित तबके को वापस लौटा रही है, जिसका वास्तव में उस पर हक है। दूसरा यह कि माफिया चाहते हैं कि समाज उन्हें कानून से ऊपर समझे। जब सरकार उनके अवैध साम्राज्यों को मिट्टी में मिलाकर वहां गरीबों को बसाती है, तो वह माफिया के 'इकबाल' को हमेशा के लिए दफन कर देती है। 
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योगी आदित्यनाथ ने नामों के जरिए सांस्कृतिक और राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया है। उनका यह सफर बहुत पुराना और स्पष्ट वैचारिक प्रतिबद्धता से जुड़ा हुआ है। इलाहाबाद को प्रयागराज करना, फैजाबाद को अयोध्या करना, या मुगलसराय स्टेशन का नाम पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रखना, ये सभी कदम उत्तर प्रदेश को उसकी मूल सांस्कृतिक पहचान वापस लौटाने और औपनिवेशिक व आक्रांताओं की गुलामी के प्रतीकों को मिटाने के प्रयास रहे हैं। लेकिन कसारी-मसारी का कृष्णपुरी होना इन सबसे एक कदम आगे की बात है। पिछले नामकरण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सुधार थे, जबकि यह नामकरण एक 'समकालीन सामाजिक मुक्ति' का प्रतीक है। यह सिर्फ इतिहास को सुधारना नहीं है, बल्कि वर्तमान को खौफ से आजाद कर भविष्य को सुरक्षित करना है।

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक हरि शंकर मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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