फिल्म नहीं बनी लेकिन मेरा भरोसा बना रहा
संग्राम सिंह ने रियलिटी शो के बाद एक फिल्म पर काम करना शुरू किया, जो बन नहीं सकी। इस अनुभव पर वह कहते हैं, ‘मेरी जिंदगी में श्याम बाबू एक मिरकल की तरह आए। कोई जान-पहचान वाला था, जिसने कहा कि एक फिल्म बन रही है। इंडिया के पहले रेसलर पर और तुम्हें बात करनी चाहिए। मुझे उस वक्त तक कुछ भी अंदाजा नहीं था, न सिनेमा के मायने, न कैमरे के सामने खड़े होने की समझ। मैं उस फिल्म के लिए इंडिया का पहला ब्रांड एंबेसडर और स्पीकर बना। फैमिली वेलफेयर से लेकर एंटरटेनमेंट तक की बात उस एक मीटिंग में हुई। लेकिन श्याम बाबू ने मुझसे एक वादा लिया कि मैं अगले कुछ साल सिर्फ इस प्रोजेक्ट पर फोकस करूंगा और कोई दूसरा काम नहीं करूंगा। मैंने हां कर दिया और वहीं से एक नई शुरुआत हुई।
तीन साल की मेहनत, सेविंग्स, उम्मीद...सब खत्म हो गया
संग्राम सिंह आगे बताते हैं, ‘नितिन देसाई जी प्रोजेक्ट से जुड़ गए, एक बड़ी टीम तैयार होने लगी, फिल्म अनाउंस हो गई, नाम आने लगे, न्यूज में मेरी चर्चा होने लगी। लेकिन फिर किसी कारण से वो फिल्म रुक गई। कोई और होता तो टूट जाता, लेकिन मेरे पास टूटने का विकल्प कभी था ही नहीं। तीन साल तक कोई कमाई नहीं हुई। मैं हर रोज अपनी सेविंग्स से ही जिंदगी चला रहा था और खाली समय में मराठी, अभिनय और टेक्निकल चीजें सीखनी शुरू कर दीं। मुझे यह तक नहीं पता था कि कैमरे की लाइट कैसी होती है या डायलॉग कैसे बोलते हैं। लेकिन मैं सीखने में लगा, क्योंकि मुझे खुद पर भरोसा था। तीन साल की मेहनत, सेविंग्स, उम्मीद...सब खत्म हो गया था। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं छोड़ी। फिर श्याम बाबू ने ही समझाया कि सिर्फ एक्टिंग नहीं करनी है, अभिनय समझना है।’
अब सिर्फ वो फिल्म करता हूं, जो आत्मा से जुड़ती है
आगे भी संग्राम सिंह को फिल्म ऑफर होती हैं, उन्हें किस आधार पर सेलेक्ट करते हैं? यह पूछने पर वह कहते हैं, ‘जब फिल्म नहीं बनी तो मैंने एक गाना किया। आगे भी प्रोजेक्ट्स आए, फिर रुके, फिर लौटे। एक फिल्म करने वाले थे, सुपरस्टार के साथ कुश्ती का सीन था। मैंने मना कर दिया क्योंकि अब मैं समझ चुका था कि सिनेमा सिर्फ शोहरत नहीं है, जिम्मेदारी है। कुछ लोग तो आए जिन्होंने 30-50 लाख देने की बात कही। लेकिन मैं सोचता था, अगर कहानी में जान नहीं है, तो पैसा किस काम का? मैं वो फिल्में करना चाहता था जो जिंदगी बदलें, कम से कम किसी एक की।‘ अब जब लोग स्क्रिप्ट लाते हैं, तो मैं सबसे पहले ये सोचता हूं कि क्या मैं इस कहानी में अपना सच देखता हूं? क्या ये मेरी आत्मा से मेल खाती है? अगर हां, तो मैं सब कुछ छोड़कर वो करता हूं। वरना मैं गर्मियों में उन लोगों को पानी पिलाता हूं, सर्दियों में रस और चुपचाप अलविदा कह देता हूं।’